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नयी दिल्ली। 15 अगस्त की सुबह लाल किले की प्राचीर से जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, तो वीआइपी दीर्घा की कुछ खाली कुर्सियों ने सियासी पंडितों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। मौका राष्ट्रीय पर्व का था, लेकिन मंच के सामने से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता एवं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे नदारद थे। देखते ही देखते लाल किले का यह दृश्य टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर एक गरमा-गरम सियासी बहस में बदल गया।
अब जरा तसल्ली से और बिना लाग-लपेट के समझिए कि यह पूरा मामला आखिर है क्या।
कांग्रेस के गलियारों से जो बात निकलकर आयी, उसकी मुख्य जड़ प्रोटोकॉल और सीटिंग अरेंजमेंट से जुड़ी नाराजगी है। भारतीय संविधान और प्रशासनिक व्यवस्था में एक व्यवस्था होती है, जिसे 'टेबल ऑफ प्रेसिडेंस' यानी वरीयता क्रम कहा जाता है। इसके मुताबिक नेता प्रतिपक्ष का पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष होता है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि इस संवैधानिक पद की गरिमा के हिसाब से उन्हें पहली पंक्ति में जगह मिलनी चाहिए थी, जबकि पिछले मौकों पर उन्हें पीछे की कतारों में बैठाने जैसी बातें सामने आयी थीं। कांग्रेस का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि विपक्ष के संवैधानिक दर्जे की अनदेखी का मामला है।
उधर, भारतीय जनता पार्टी ने इस गैर-हाजिरी पर कड़ा रुख अपनाया। बीजेपी प्रवक्ताओं और नेताओं का सीधा कहना है कि 15 अगस्त किसी एक दल या सरकार का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का साझा उत्सव है। सत्तापक्ष का आरोप है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन आजादी के महापर्व पर संवैधानिक परम्पराओं और लाल किले के ऐतिहासिक आयोजन से दूरी बनाना लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुकूल नहीं है। बीजेपी इसे विपक्ष का नकारात्मक रवैया करार दे रही है।
हालाँकि, ऐसा नहीं है कि दोनों नेताओं ने आजादी का जश्न नहीं मनाया। लाल किले के बजाय राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय पहुँचे, जहाँ उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ तिरंगा फहराया, मिठाइयाँ बाँटीं और आजादी के दीवानों को याद किया। लेकिन सिक्के का दूसरा और सबसे गंभीर पहलू है कि यह विवाद केवल एक कुर्सी या पहली कतार का नहीं है, यह इस बात का आईना है कि देश की राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच दूरियुँ कितनी चौड़ी हो चुकी हैं। राष्ट्रीय एकता और साझा संकल्प के प्रतीकात्मक मौकों पर भी जब दोनों पक्ष एक जाजम पर सहज न दिखें, तो यह बताता है कि हमारे लोकतांत्रिक विमर्श में बुनियादी संवाद और आपसी भरोसे की कितनी कमी आ चुकी है।