Courtesy: PM Modi Instagram
नयी दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दावा किया है कि भारत आर्थिक विकास के मामले में अपनी गति बनाये हुए है और इसने 7.8 प्रतिशत विकास दर प्राप्त किया है। प्रधानमंत्री ने विरोधियों पर भी हमला बोला और कहा कि वे झूठ फैलाने में लगे हैं फिर भी जो सच्चाई है वह सामने आ ही जाती है। प्रधानमंत्री का दावा भले ही तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसके साथ एक बड़ा अंतर्विरोध भी जुड़ा हुआ है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति मध्यम वर्ग के लोगों की है।
मध्यम वर्ग, जिन्हें हम Middle-Class भी कहते हैं, आज सबसे ज्यादा दबाव में है क्योंकि उनकी आय उस गति से नहीं बढ़ी जिस गति से दैनिक उपभोग की आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। दाल, तेल, सब्जियाँ, बच्चों की स्कूल फीस और अस्पताल के खर्चे जिस तेजी से बढ़े हैं, उस तेजी से उनके वेतन नहीं बढ़े। यही नहीं, मिडिल क्लास पूरी ईमानदारी से इनकम टैक्स भी देता है और हर सामान की खरीद पर Indirect Tax के तौर पर GST भी। लेकिन इसके बदले में उसे मुफ्त शिक्षा, मुफ्त इलाज या सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं। नतीजा यह है कि उनके पेट खाली रह जाते हैं। सरकार 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त राशन गेहूं-चावल दे रही है। इससे भले ही उनका पेट भर जाता है और किसी तरह जीवित रहने की कोशिश करता है। लेकिन, इंसान के लिए सिर्फ पेट भरना जरूरी नहीं, पोषण की भी जरूरत है जो कि नहीं मिल पाता है। पोषण के लिए दाल, दूध, सब्जियां जरूरी हैं।
दरअसल भारत की जो आर्थिक व्यवस्था है वह दोहरे सच पर आधारित है। जहाँ Macroeconomic (समष्टि आर्थिक तरक्की) तो ऐतिहासिक है, लेकिन इसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की जीडीपी के आंकड़े के आधार पर प्रधानमंत्री के दावे का आधार जीडीपी ग्रोथ है। जीडीपी ने जो आँकड़े पेश किये हैं उसके मुताबिक वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत ने 7.8 प्रतिशत की शानदार आर्थिक विकास दर दर्ज की है, जो कि दुनिया की पाचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2026 में इसका नॉमिनल जीडीपी 4.15 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पिछले एक दशक में लगभग 17.1 करोड़ (171 मिलियन) लोगों को अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) से बाहर निकाला है, जिससे अति-गरीबी दर घटकर मात्र 2.3% रह गई है।
प्रधानमंत्री के दावे अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि देश इतनी तरक्की कर रहा है, तो आम जनता को आर्थिक तंगी या संघर्ष का सामना क्यों करना पड़ रहा है? अर्थशास्त्रियों और वैश्विक रिपोर्ट्स ने इसके पीछे जो मुख्य कारण बताये हैं, उसके मुताबिक बढ़ती आर्थिक असमानता है। भारत में विकास का सबसे बड़ा हिस्सा कुछ ही हाथों में सिमट रहा है। वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में शामिल हो चुका है। देश की शीर्ष एक प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 22 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है, जबकि नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के हिस्से में केवल 15 प्रतिशत आय ही आती है। इसे कई विशेषज्ञ 'के-शेप्ड' रिकवरी कहते हैं, जहाँ अमीर और अमीर हो रहे हैं, जबकि गरीब वहीं थमे हुए हैं।
जीएनआइओटी (प्राफेशनल स्टडीज) ग्रेटर नोएडा के इकोनिमिक्स, काॅमर्स एंड मैनजमेंट फैकल्टी एवं आर्थिक मामलों की जानकार प्रो. रीता कुमारी का कहना है कि रोज़गारविहीन विकास है यह। जीडीपी बढ़ रही है क्योंकि कॉर्पोरेट मुनाफा, आइटी, रियल एस्टेट और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे सेक्टर्स, जिन्होंने हाल ही में 12.1 प्रतिशत ग्रोथ दिखाई, तेज़ी से बढ़ रहे हैं। लेकिन ये सेक्टर्स बहुत अधिक मैनपावर का इस्तेमाल नहीं करते। भारत में इस समय शिक्षित युवाओं के बीच बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। देश की लगभग 45-50 प्रतिशत कार्यबल आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन प्राथमिक/कृषि क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.9 प्रतिशत से 3.6 प्रतिशत के आसपास धीमी बनी हुई है। इस वजह से ग्रामीण आय में सुधार नहीं हो पा रहा है। विश्व बैंक के अनुसार, भले ही 2.15 डॉलर प्रतिदिन की दर वाली 'अत्यधिक गरीबी' कम हुई हो, लेकिन भारत जैसे निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए वास्तविक जीवन स्तर का मानक 4.20 डॉलर प्रतिदिन होना चाहिए। इस व्यापक मानक के तहत, आज भी भारत की लगभग 23.9 प्रतिशत आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक रूप से असुरक्षित या गरीब हैं। ये वो लोग हैं जो रोज़ कमाते-खाते हैं और महंगाई (जैसे खाद्य पदार्थों के दाम) बढ़ते ही संकट में आ जाते हैं।
प्रो. रीता के मुताबिक, भारत में ग्रामीण और शहरी आय के बीच का अंतर देश के आर्थिक ढांचे की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। प्रधानमंत्री के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच जो विरोधाभास दिखता है, उसकी एक बड़ी वजह यही ग्रामीण-शहरी खाई है। शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की क्रय शक्ति और आय काफी कम है। भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय का हालिया घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण पर गौर करने पर पता चलता है कि ग्रामीण भारत में एक व्यक्ति का औसत मासिक खर्च लगभग 3 हजार 773 रुपये है। जबकि इसके ठीक उलट शहरी भारत में यह आंकड़ा लगभग 6 हजार 459 रुपये है। यह आँकड़ा दिखाता है कि ग्रामीण नागरिक की तुलना में एक शहरी नागरिक औसतन 71 प्रतिशत से अधिक खर्च करता है, जो सीधे तौर पर उनकी आय के अंतर को दर्शाता है।
प्रो. रीता कुमारी कहती हैं कि आय के इस अंतर के पीछे सबसे बड़ा कारण दोनों क्षेत्रों में काम के अवसरों का अलग होना है। ग्रामीण भारत की लगभग 50-60 प्रतिशत आबादी आज भी खेती या उससे जुड़े कामों पर निर्भर है। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान केवल 15-16 प्रतिशत है, लेकिन इस पर निर्भर आबादी बहुत बड़ी है। खेती मौसम पर निर्भर है, जिससे साल भर नियमित आय नहीं होती। शहरों में अर्थव्यवस्था सर्विस सेक्टर (आइटी, बैंकिंग, रिटेल) और मैन्युफैक्चरिंग पर टिकी है। देश की जीडीपी का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं सेक्टर्स से आता है, जहाँ वेतन और मुनाफे की दरें कृषि के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती हैं। ग्रामीण इलाकों में एक बहुत बड़ी आबादी दिहाड़ी मज़दूरी या असंगठित क्षेत्र में काम करती है। यहाँ न्यूनतम मज़दूरी कम है और रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती। मनरेगा जैसी योजनाएँ संकट के समय सहारा तो देती हैं, लेकिन वे केवल जीवन निर्वाह मात्र के लिए हैं, आय बढ़ाने के लिए नहीं। शहरों में औपचारिक (Formal) नौकरियां अधिक हैं, जहाँ पीएफ, मेडिकल और निश्चित मासिक वेतन जैसी सुविधाएँ मिलती हैं। इससे शहरी परिवारों में वित्तीय स्थिरता रहती है।
प्रो. रीता कहती हैं कि देश में आने वाला अधिकांश विदेशी निवेश (FDI) और निजी निवेश बड़े शहरों या उनके आस-पास के क्षेत्रों में ही सीमित रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में फैक्ट्रियों और कॉर्पोरेट ऑफिसों की भारी कमी है। अच्छी उच्च शिक्षा, तकनीकी ट्रेनिंग और कौशल विकास (Skill Development) के केन्द्र शहरों में हैं। ग्रामीण युवाओं को बेहतर आय वाले अवसरों के लिए शहरों की तरफ पलायन (Migration) करना पड़ता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर ही बनी रहती है। ग्रामीण इलाकों में आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल बुनियादी भोजन पर खर्च हो जाता है। इसके विपरीत, शहरी आबादी के पास भोजन के बाद स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, मनोरंजन और बचत के लिए पैसा बचता है, जिससे उनकी सम्पत्ति और जीवन स्तर में लगातार सुधार होता है। भारत का आर्थिक विकास मुख्य रूप से 'शहरी और कॉर्पोरेट संचालित' है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोज़गार (जैसे फूड प्रोसेसिंग, कुटीर उद्योग, ग्रामीण पर्यटन) और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास तेज़ी से नहीं होता, तब तक देश की जीडीपी बढ़ने के बावजूद ग्रामीण भारत में 'फाँकाकशी' या आर्थिक तंगी का अहसास पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर होने वाले पलायन का भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा और व्यापक असर पड़ता है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 और विभिन्न आर्थिक रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रवासन केवल एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों का जाना नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक ढाँचे को पूरी तरह से नया आकार दे रहा है। शहरों में कमाने वाले प्रवासी मज़दूर और पेशेवर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा वापस गाँव में अपने परिवारों को भेजते हैं। इस पैसे का उपयोग ग्रामीण परिवार भोजन, बच्चों की शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और कर्ज चुकाने में करते हैं। विश्व बैंक और यूएनडीपी के अध्ययनों के अनुसार, प्रवासियों द्वारा भेजे गये धन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की दर में उल्लेखनीय कमी आयी है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, गाँवों से युवाओं के बड़े पैमाने पर पलायन करने से गाँवों में केवल बुजुर्ग और महिलाएं ही रह जाते हैं, जहाँ खेती का पूरा बोझ महिलाओं पर आ जाता है। बुआई और कटाई के सीज़न में ग्रामीण इलाकों में अकुशल मज़दूरों की भारी कमी हो जाती है, जिससे कृषि लागत (Wages) बढ़ जाती है और खेती का मुनाफा कम हो जाता है।
शहरों की ओर पलायन करने वाले प्रवासी देश की Informal(अनौपचारिक) अर्थव्यवस्था के रीढ़ हैं, जो भारत के कुल जीडीपी में लगभग 45 प्रतिशत का योगदान देती है। कंस्ट्रक्शन (Construction), रियल एस्टेट, कपड़ा उद्योग, ई-कॉमर्स डिलीवरी और घरेलू सेवाओं जैसे क्षेत्रों को प्रवासी मज़दूरों के कारण बेहद किफायती और कुशल लेबर मिल जाती है। इसके बिना शहरों का तेजी से विकास संभव नहीं था। भारत की आर्थिक समीक्षा 2025-26 ने चेतावनी दी है कि भारतीय शहर अब अपनी क्षमता की सीमा पर पहुँच रहे हैं। निरंतर पलायन के कारण शहरों के संसाधन कम पड़ रहे हैं। शहरों में रहने की उच्च लागत के कारण निम्न-आय वर्ग के प्रवासी महंगे घर नहीं खरीद पाते, जिससे अनधिकृत कॉलोनियाँ और झुग्गियाँ बढ़ती हैं। इससे शहरों में साफ पानी, बिजली, और सीवरेज तंत्र पर भारी दबाव पड़ता है। शहरों में अकुशल श्रमिकों की भारी आमद के कारण श्रम बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ जाती है, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र में न्यूनतम मज़दूरी की दरें नहीं बढ़ पातीं और प्रवासियों का शोषण होता है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि Migration (प्रवासन) को रोका नहीं जा सकता और न ही रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह आर्थिक गतिशीलता का प्रतीक है। लेकिन, इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारत सरकार को दोतरफा नीतियां अपनानी होंगी। ग्रामीण क्षेत्रों में ही गैर-कृषि रोजगार (फूड प्रोसेसिंग और कुटीर उद्योग) पैदा किये जायें ताकि युवाओं को गाँव न छोड़ना पड़े। टियर-2 और टियर-3 शहरों का विकास किया जाये ताकि दिल्ली, मुम्बई और बेंगलुरु जैसे महानगरों पर दबाव कम हो सके।