Courtesy: AI
नोएडा। भारतीय राजनीति में जब पारिवारिक रिश्ते और सत्ता की महत्वाकांक्षाएं आमने-सामने आती हैं, तो उसका असर केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता; वह पूरे दल और चुनावी समीकरणों को हिला देता है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भीतर हालिया घटनाक्रम—जहां पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को एक बार फिर सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया और उनके ससुर एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य डॉ. अशोक सिद्धार्थ को अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर का रास्ता दिखाया, ने सियासी हलकों में एक पुरानी बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे प्रकरण की तुलना बिहार के बहुचर्चित 'लालू प्रसाद बनाम चंद्रिका राय' विवाद से कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्रिका राय की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने जिस तरह राजद और लालू परिवार को गहरा सियासी नुकसान पहुंचाया था, वैसा ही कुछ अब बसपा और आकाश आनंद के साथ होने जा रहा है?
बिहार में 2018 के बहुचर्चित प्रकरण की तरह ही आज बसपा में भी वही पुराना सियासी पैटर्न दोहराता दिख रहा है, जहां पारिवारिक रिश्ते और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का टकराव सीधे पार्टी संगठन पर असर डालता है। जिस तरह लालू प्रसाद के परिवार में तेजप्रताप के ससुर चंद्रिका राय की राजनीतिक अपेक्षाओं और अंदरूनी कलह ने राजद की छवि और सांगठनिक संतुलन को गहरा आघात पहुंचाया था, ठीक वैसा ही समीकरण अब उत्तरप्रदेश में देखने को मिल रहा है। बहुजन समाज पार्टी में भी आकाश आनंद के ससुर डॉ. अशोक सिद्धार्थ के दखल और बढ़ते सियासी प्रभाव के टकराव ने अंततः उन्हें निष्कासन तक पहुंचा दिया, जिसका सीधा खामियाजा आकाश आनंद के राजनीतिक कद और पार्टी की आंतरिक स्थिरता को भुगतना पड़ रहा है।
उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का संगठनात्मक ढांचा किसी भी अन्य क्षेत्रीय दल से एकदम अलग है, जहाँ पार्टी पूरी तरह मायावती के 'एकला चलो' और सख्त अनुशासन के सिद्धांत पर टिकी है। डॉ. अशोक सिद्धार्थ बसपा के पुराने सिपाही रहे हैं, जिन्हें मायावती ने विधान परिषद से लेकर राज्यसभा तक भेजा। मार्च 2023 में जब मायावती के घोषित उत्तराधिकारी माने जा रहे आकाश आनंद का विवाह अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा से हुआ, तो सिद्धार्थ का कद पार्टी में 'समधी' होने के नाते शक्ति के एक नये केन्द्र के रूप में देखा जाने लगा। हालांकि, मायावती के नेतृत्व में कभी भी किसी समानांतर शक्ति केन्द्र को बर्दाश्त नहीं किया गया। महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में सांगठनिक दखल और टिकट वितरण में कथित मनमानी के आरोपों के बाद मायावती ने सख्त रुख अपनाते हुए सिद्धार्थ को निष्कासित कर दिया।
अशोक सिद्धार्थ पर हुई इस कार्रवाई की सीधी गाज आकाश आनंद की राजनीतिक स्थिति पर गिरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान आक्रामक प्रचार के बाद आकाश को पहले 'अपरिपक्व' बताकर हटाया गया, फिर कुछ समय बाद उनकी वापसी हुई, और अब एक बार फिर उन्हें सभी पदों से बेदखल कर दिया गया है। हालिया बैठकों में आकाश के छोटे भाई ईशान आनंद की मंच पर मौजूदगी ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि बसपा सुप्रीमो संगठन और कमान पर अपने पूर्ण नियंत्रण से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम और परिवारवाद पर चोट को लेकर दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसे अलग नज़रिये से भी देख रहा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर एवं दलित चिंतक डॉ. गंगा सहाय मीणा कहते हैं— "जहां देश की सभी प्रमुख पार्टियों में परिवारवाद हावी है, ऐसे में बहन मायावती जी द्वारा आकाश आनंद को पार्टी के प्रमुख पदों से मुक्त किया जाना निश्चित तौर पर लोकतंत्र के लिए, उनकी स्वयं की पार्टी के लिए और बहुजनों के लिए एक अच्छा संदेश है और इसका सकारात्मक प्रभाव आनेवाले चुनाव में दिखाई देगा, ऐसी मुझे उम्मीद है। साथ ही बहन जी को जमीनी स्तर पर कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाना चाहिए, इससे भी उनकी पार्टी की छवि सुधरेगी, और अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती 2027 के उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव को लेकर है, उनको अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करके वही मुकाम हासिल करना है, वही सम्मान हासिल करना है जो पिछले दिनों में कुछ कम हो गया है।"
अक्सर यह कयास लगाया जाता है कि क्या आकाश आनंद भी उपेक्षित महसूस कर तेजप्रताप यादव की तरह बागी तेवर दिखा सकते हैं, लेकिन राजनीतिक यथार्थ को देखें तो दोनों मामलों में बुनियादी फर्क है। बिहार में तेजप्रताप का विवाद मुख्य रूप से वैवाहिक और व्यक्तिगत असंगति से शुरू होकर बाद में सियासी बना था, जबकि यूपी में आकाश आनंद का मामला पूरी तरह संगठनात्मक नियंत्रण, अनुशासन और शक्ति-संतुलन की खींचतान का है। इसके अलावा, पारिवारिक स्तर पर आकाश और डॉ. प्रज्ञा के वैवाहिक रिश्ते में कोई सार्वजनिक या घरेलू दरार नहीं है; यहां टकराव सीधे तौर पर उनके ससुर डॉ. अशोक सिद्धार्थ और बसपा नेतृत्व के बीच है।
सियासी वजूद और बगावत की गुंजाइश के मामले में भी दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। तेजप्रताप यादव का बिहार में अपना एक जमीनी जनाधार और आक्रामक देशी छवि रही है, साथ ही वो विधायक और मंत्री के रूप में चुनावी राजनीति में खुद को साबित कर चुके थे, जिसके बूते उन्होंने कई बार पार्टी लाइन से अलग हटकर बयान दिये और अपने समानांतर संगठन तक खड़े किये। इसके उलट, आकाश आनंद का राजनीतिक अस्तित्व पूरी तरह मायावती के आशीर्वाद और कांशीराम की बनायी कैडर विरासत पर टिका है। बसपा की संगठनात्मक संरचना में अलग होकर वोट बैंक पर दावा ठोकने की कोई मिसाल नहीं मिलती, इसलिए आकाश आनंद के पास खुले तौर पर बगावत करने की राजनीतिक गुंजाइश बेहद सीमित है और ऐसा कोई भी कदम उनके सियासी भविष्य के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। आकाश के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती अपने ससुर के सियासी प्रभाव से खुद को पूरी तरह अलग साबित करना और मायावती का भरोसा दोबारा हासिल करना है।
लालू प्रसाद के सामने जब पारिवारिक संकट खड़ा हुआ था, तब उनके पास तेजस्वी यादव के रूप में स्थापित और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सर्वस्वीकार्य उत्तराधिकारी मौजूद था, जिन्होंने आगे चलकर संगठन की पूरी कमान संभाली और राजद को बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में बनाये रखा। इसके विपरीत, मायावती और बहुजन समाज पार्टी के सामने मौजूद चुनौतियां कहीं अधिक गंभीर और अस्तित्व से जुड़ी हैं। पिछले एक दशक में बसपा का जनाधार लगातार सिमटा है और पार्टी 2022 के विधानसभा तथा 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है। ऐसे संकट के समय उत्तराधिकार को लेकर लगातार बना असमंजस स्थिति को और पेचीदा कर रहा है। आकाश आनंद को युवाओं और कैडर के बीच एक मुखर, आधुनिक दलित चेहरे के तौर पर उभारा गया था, लेकिन बार-बार उन्हें पद से हटाने और फिर बहाल करने के सिलसिले ने जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम पैदा कर दिया है।
इस नेतृत्व संकट के बीच बाहर और भीतर, दोनों तरफ से बसपा पर दबाव बढ़ता जा रहा है। एक तरफ पश्चिमी उत्तरप्रदेश और दलित युवाओं के बीच नगीना सांसद चन्द्रशेखर आज़ाद जिस आक्रामकता से अपनी जमीन मजबूत कर रहे हैं, वह बसपा के पारंपरिक कोर वोट बैंक में सीधी सेंध लगा रहा है। वहीं दूसरी ओर, पार्टी के भीतर अब आकाश के छोटे भाई ईशान आनंद को विकल्प के तौर पर आगे लाने की चर्चाएं तेज हैं। अगर पार्टी के भीतर ही उत्तराधिकार को लेकर एक नया शक्ति-संतुलन या पारिवारिक होड़ शुरू होती है, तो यह पहले से कमजोर संगठनात्मक ढांचे को और बिखेर सकती है। साफ है कि जहां लालू प्रसाद का उत्तराधिकार स्पष्ट था और राजद चुनावी रूप से प्रासंगिक बनी रही, वहीं मायावती के सामने गिरता जनाधार, बाहरी विकल्प और अंदरूनी अस्थिरता मिलकर बसपा के लिए लालू से कहीं बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर रहे हैं।
चंद्रिका राय के मामले में महत्वाकांक्षा और रिश्तों के टकराव ने न सिर्फ पारिवारिक रिश्ते को तोड़ा, बल्कि उनके खुद के लम्बे राजनीतिक सफर को भी हाशिये पर ला खड़ा किया। बसपा में डॉ. अशोक सिद्धार्थ का निष्कासन यह साफ करता है कि पार्टी में किसी भी नाते-रिश्तेदार की समानांतर सत्ता स्वीकार्य नहीं होगी। आकाश आनंद तेजप्रताप की तरह बगावत की राह नहीं चुन सकते, क्योंकि नीले झंडे और मायावती के समर्थन के बिना दलित राजनीति में उनकी जमीन शून्य हो जायेगी। असली चिंता आकाश के बागी होने की नहीं, बल्कि इस बात की है कि नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर पार्टी के भीतर चल रही यह अनिश्चितता कहीं बहुजन समाज पार्टी के बचे-खुचे सियासी जनाधार को भी पूरी तरह खत्म न कर दे।