अर्थव्यवस्था इतनी तीव्र गति से तो उच्च शिक्षित युवाओं को रोजगार क्यों नहीं : रघुराम राजन

आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए केवल सांख्यिकीय आंकड़ों पर निर्भरता सही नहीं

GDP

Courtesy: www.indiaipo.in

नयी दिल्ली। वित्तीय वर्ष 2026—27 की पहली तिमाही के लिए जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जो बढ़ोतरी हुई है उसको लेकर भारतीय राजनीति और आर्थिक जगत में एक नयी बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार का मानना है कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और सही आर्थिक नीतियों का प्रमाण है, वहीं विपक्ष इसे 'आंकड़ों की बाजीगरी' बता रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के दावे—प्रतिदावे के बीच देश और दुनिया के जाने-माने आर्थिक विशेषज्ञ एवं नीति—निर्माता भी इस बहस में कूद पड़े हैं, जिससे वास्तविक विकास दर और जमीनी हकीकत को लेकर कई गंभीर आर्थिक पहलू सामने आये हैं।

केन्द्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने सकल घरेलू उत्पाद की जो पहली तिमाही रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक, भारत ने सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 का आँकड़ा प्राप्त किया है। आर्थिक आंकड़े जारी होने के बाद सत्ता पक्ष बेहद उत्साहित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन आँकड़ों की सराहना करते हुए इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और पिछले 10 वर्षों में किये गए परिवर्तनकारी सुधारों का परिणाम बताया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) के सदस्य संजीव सान्याल के मुताबिक, भारत की जीडीपी गणना की पद्धति (Methodology) को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य वैश्विक निकायों के मानकों के अनुरूप पूरी तरह से अपडेट किया गया है। कोई भी गंभीर अर्थशास्त्री इन आधिकारिक आँकड़ों की साख पर सवाल नहीं उठा सकता। 

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं के साथ ही अन्य विपक्षी नेताओं ने इन आंकड़ों पर कड़े सवाल उठाये और कहा कि हेडलाइन नम्बर्स जितने बड़े दिख रहे हैं, आम जनता की आर्थिक स्थिति और निवेश का माहौल उसके ठीक विपरीत दिख रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जीडीपी (GDP) का नया मतलब 'ग्रेटली डिस्टॉर्टेड पिक्चर' बताया। उनका कहना है कि सरकार ने चालू वर्ष में दो बार जीडीपी गणना की कार्यप्रणाली में बदलाव किया है ताकि वास्तविक आर्थिक मंदी को ​छिपाया जा सके। उन्होंने कहा कि यह डेटा देश के घरेलू और विदेशी निवेशकों के बीच बेहद कमजोर निजी निवेश को दर्शाने में पूरी तरह विफल रहा है। विपक्ष का कहना है कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित मुद्रास्फीति के उच्च स्तर (9 प्रतिशत से अधिक) होने के बावजूद, सरकार जीडीपी डिफ्लेटर का डेटा महज 2.3 प्रतिशत के आसपास दिखा रही है, जो एक बड़ा विरोधाभास है। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने सवाल उठाया कि क्या 7.8 प्रतिशत की यह वृद्धि गरीब और मध्यम वर्ग की थाली तक पहुंच रही है, क्योंकि जमीनी स्तर पर दूध, डीजल, प्याज और चीनी के दाम आसमान छू रहे हैं।

विपक्ष के हमले के बाद केन्द्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सरकार की तरफ से मोर्चा संभाल रखा है। पीयूष गोयल ने विपक्ष और आलोचकों के दावों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि आर्थिक आँकड़े मंत्रियों द्वारा नहीं बनाये जाते हैं। आलोचना करने वाले देश को गुमराह कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री गोयल के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जो कि वैश्विक स्तर पर एक 'मजबूत और विश्वसनीय साझेदार' के रूप में देश की छवि को दर्शाता है।

सकल घरेलू राजनीतिक घमासान के बीच, पूर्व नौकरशाहों और प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों ने आंकड़ों के गणित और अर्थव्यवस्था की वास्तविक सेहत का गहरा विश्लेषण किया है। हालाँकि विशेषज्ञों की भी राय दो अलग-अलग ध्रुवों में बंटी दिखाई दे रही है— एक ध्रुव आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखता है वहीं दूसरा ध्रुव इसे सकारात्मक बताता है। 

विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इस बात पर सहमत है कि 7.8 प्रतिशत की हेडलाइन ग्रोथ रेट निश्चित रूप से भारत को वैश्विक पटल पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करती है। हालांकि, इस ग्रोथ की गुणवत्ता को लेकर चिंताएँ भी जतायी जा रही हैं। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सहित कई अर्थशास्त्रियों ने यह बुनियादी सवाल उठाया है कि यदि अर्थव्यवस्था इतनी तीव्र गति से बढ़ रही है, तो उच्च शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार क्यों पैदा नहीं हो रहे हैं? आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए केवल सांख्यिकीय आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक मजदूरी में वृद्धि और कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों की आय में सुधार करना होगा। 

इस पूरे विवाद को हवा देने में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के एक बयान ने बड़ी भूमिका निभायी। गर्ग का मानना है कि यदि सरकार पिछले वित्तीय वर्ष के नॉमिनल जीडीपी डेटा में नीचे की ओर संशोधन नहीं करती और पुरानी सीरीज के आधार पर गणना होती, तो मौजूदा विकास दर महज 2.6 प्रतिशत के आसपास बैठती। आधार वर्ष और नयी सांख्यिकीय श्रृंखला के कारण विकास दर कृत्रिम रूप से ऊंची दिखाई दे रही है। जाने-माने शेयर बाजार विशेषज्ञ शंकर शर्मा ने भी इस बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि देश की 'रियल फील जीडीपी' वास्तव में केवल 2-3 प्रतिशत की दर से ही बढ़ रही है। उन्होंने तर्क दिया कि शहरों की बदहाल स्थिति, बुनियादी ढांचे का अभाव और आम नागरिकों के जीवन स्तर में गिरावट इस बात का प्रमाण है कि कागजी आँकड़े और वास्तविक जीवन के अनुभव मेल नहीं खा रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि वर्तमान आंकड़ों के पीछे आम परिवारों के खर्च और बचत के पैटर्न में एक सतर्कता देखी जा रही है। प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से सोने की खरीद कम करने और बचत बढ़ाने की अपील को भी इसी संदर्भ से जोड़कर देखा जा रहा है।

दूसरी तरफ, कई शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने सुभाष चंद्र गर्ग और विपक्ष के दावों को पूरी तरह से अतार्किक और 'सेब की तुलना संतरे' से करने जैसा बताया है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्र उन्हीं अर्थशास्त्रियों में हैं। उन्होंने गर्ग के दावों को 'घोर त्रुटिपूर्ण' बताया। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के ठोस और वास्तविक प्रमाण बाजार में मौजूद हैं। बैंक क्रेडिट ग्रोथ में लगातार 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि, टैक्स कलेक्शन (GST और डायरेक्ट टैक्स) में उछाल और पैसेंजर वाहनों की रिकॉर्ड बिक्री वास्तविक आर्थिक गतिविधि के पक्के सबूत हैं। साथ ही निर्माण क्षेत्र के संकेतक भी यह स्पष्ट करते हैं कि निजी निवेश में सुधार हो रहा है। 

रेटिंग एजेंसी इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, भले ही यह वृद्धि पिछली तिमाही (Q4 FY26) के 8.6 प्रतिशत से थोड़ी कम है, लेकिन यह इक्रा के स्वयं के 7.0 प्रतिशत के अनुमान से बहुत बेहतर है। उन्होंने माना कि असमान मानसून और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बनाये रखा है। 

राजनीतिक बयानों से हटकर यदि आधिकारिक आँकड़ों के घटकों को देखें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था में मिले-जुले संकेत दिखाई दे रहे हैं। वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 7 प्रतिशत के अनुमान से बेहतर और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज है। नॉमिनल जीडीपी 10.3 प्रतिशत कीमतों में बदलाव और मुद्रास्फीति को शामिल करते हुए वृद्धि दर स्थिर बनी हुई है। सकल मूल्य वर्धित 8.2 प्रतिशत विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में मजबूत उत्पादन का संकेत है। घरेलू खपत 7.1 प्रतिशत उपभोग में सुधार हो रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में मांग अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं है। निवेश 11.9 प्रतिशत बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च के चलते निवेश की गति तेज है। निर्यात 12 प्रतिशत वैश्विक मंदी के बावजूद निर्यात बेहतर है, लेकिन आयात बढ़ने से शुद्ध निर्यात आगे चलकर ड्रैग कर सकता है।

भले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष की यह सांख्यिकीय जंग चलती रहे, आनेवाले समय में वैश्विक तेल कीमतों के झटके, असमान मानसून का कृषि पर असर और घरेलू उपभोग की निरंतरता ही यह तय करेगी कि भारत वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अनुमानित 6.7 प्रतिशत से 7 प्रतिशत की वार्षिक विकास दर को छू पाता है या नहीं।