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नयी दिल्ली। पंजाब में नशे के बढ़ते कारोबार को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर तीखा हमला बोला है। मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संगरूर जिले के रहने वाले दलित समुदाय के गुलजार सिंह की मौत का मामला उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार के दौरान ड्रग्स का कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है और सरकार इस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि भाजपा “बहुत भारी मन और गहरे दुख” के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है। भाजपा पहले भी पंजाब से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठा चुकी है, लेकिन पंजाब में नशे का दर्द कोई आज की कहानी नहीं है। 'उड़ता पंजाब' की बातें जब भी चलती हैं, तो सरकारों के बड़े-बड़े दावे सामने रख दिए जाते हैं। पर क्या ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल खाती है? इसी सवाल को लेकर दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और सीधे मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। मामला संगरूर जिले का है, जहां एक दलित पिता गुलजार सिंह की जान चली गई। भाजपा का सीधा आरोप है कि पंजाब में ड्रग्स का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है और जो कोई इसके खिलाफ आवाज़ उठाने की जुर्रत करता है, उसे ही सिस्टम प्रताड़ित करने में जुट जाता है।
अब ज़रा इस पूरे घटनाक्रम को तफसील से समझिए कि आखिर एक आम नागरिक के साथ ऐसा क्या हुआ कि उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। गुलजार सिंह एक आम परिवार के शख्स थे। उनका बेटा 'चिट्टे' यानी सिंथेटिक ड्रग्स के दलदल में धंस चुका था। किसी भी मां-बाप के लिए अपनी औलाद को घुट-घुट कर बर्बाद होते देखना कितना बड़ा अज़ाब होता है, इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। बेटे की लत छुड़ाने के लिए गुलजार सिंह ने अपनी जमा-पूंजी झोंक दी, घर का कीमती सामान बिक गया, संपत्ति तक हाथ से निकल गई और पूरा परिवार घोर आर्थिक तंगी के मुहाने पर आ खड़ा हुआ।
इन्हीं हालातों के बीच, पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा गुलजार सिंह के गांव पहुंचे। जब सरकार का नुमाइंदा खुद गांव में खड़ा हो, तो एक लाचार पिता अपनी गुहार लेकर किसके पास जाता? गुलजार सिंह पहुंचे और भरे मजमे में मंत्री के सामने हाथ जोड़कर बेटे की नशे की लत और इलाके में खुलेआम बिक रहे 'चिट्टे' की शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि इलाके में नशा सरेआम मिल रहा है, इस पर नकेल कसी जाए और पंजाब की नौजवानी को बचाया जाए। यह कोई राजनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि एक टूटे हुए पिता की सच्ची पुकार थी।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को खौफनाक मोड़ दे दिया। गौरव भाटिया के दावों के मुताबिक, मंत्री महोदय तो वहां से चले गए, मगर गांव के सरपंच और स्थानीय नेताओं ने गुलजार सिंह को घेर लिया। उन पर दबाव बनाया जाने लगा कि उन्होंने मंत्री के सामने गलत लहजे में बात की, अपशब्द कहे, इसलिए अब उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी। ज़रा सोचिए, एक पिता जो अपने बच्चे की ज़िंदगी बचाने की भीख मांग रहा था, उसे ही मुजरिम बनाकर खड़ा कर दिया गया।
इस लगातार मानसिक दबाव, बेबसी और कथित प्रताड़ना से टूटकर गुलजार सिंह ने खौफनाक कदम उठाया और जहरीला पदार्थ निगल लिया। दम तोड़ने से पहले उन्होंने एक दर्दनाक वीडियो भी रिकॉर्ड किया। उस आखिरी वीडियो में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि नशे का जाल इलाके में बेरोकटोक फैल रहा है और प्रशासन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। इसके साथ ही उन्होंने अपनी मौत के लिए मंत्री हरपाल सिंह चीमा, स्थानीय सरपंच और कुछ अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहराया।
अब यहां सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठता है कि आखिर लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनने का यही तरीका रह गया है? जब एक आम इंसान सार्वजनिक मंच पर नशे के नेटवर्क की बात कहता है, तो पुलिस और प्रशासन को तुरंत उन नशा तस्करों पर छापा मारना चाहिए था या उस पीड़ित पिता को डराना-धमकाना चाहिए था? गौरव भाटिया ने इसी बिंदु पर आम आदमी पार्टी की सरकार को घेरते हुए पूछा कि गुलजार सिंह की उस सार्वजनिक शिकायत के बाद सरकारी तंत्र ने क्या कार्रवाई की? क्या उन ड्रग माफियाओं पर डंडा चला, या फिर सिर्फ शिकायतकर्ता का मुंह बंद करने की कोशिश हुई?
दिलचस्प बात यह भी है कि मान सरकार सिर्फ नशे के मुद्दे पर ही नहीं घिरी है, बल्कि राज्य में कानून-व्यवस्था और वादों की अनदेखी को लेकर चौतरफा राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा है। एक तरफ जहां भाजपा इस मुद्दे पर आक्रामक है, वहीं दूसरी तरफ चंडीगढ़ की सड़कों पर पंजाब कांग्रेस ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के नेतृत्व में हजारों कार्यकर्ता सेक्टर-15 स्थित कांग्रेस भवन से सीएम आवास का घेराव करने निकल पड़े। कांग्रेस का आरोप है कि पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है और सरकार कर्मचारियों से किये वादों से मुकर रही है—चाहे वह महंगाई भत्ता (DA) जारी करना हो, पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करना हो या फिर कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना। यानी एक तरफ नशा और लचर कानून-व्यवस्था का दर्द, तो दूसरी तरफ अपने हकों के लिए सड़कों पर उतरते मुलाजिम।
पंजाब में नशे को जड़ से खत्म करने और व्यवस्था बदलने के वादे हर चुनाव में गूंजते हैं, लेकिन संगरूर की यह घटना इस बात की तस्दीक करती है कि ज़मीन पर हकीकत कितनी स्याह है। भाजपा ने इसे मान सरकार की प्रशासनिक नाकामी बताते हुए मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, गुलजार सिंह के वीडियो बयानों की बारीकी से पड़ताल की जाये और जवाबदेही तय की जाये। यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक आम हिन्दुस्तानी अपनी चुनी हुई सरकार पर करता है। अगर सत्ता के सामने सच बोलना और अपने हक की बात करना ही प्रताड़ना की वजह बन जाये, तो फिर आम नागरिक अपनी फरियाद लेकर आखिर किसके दरवाजे जायेगा?