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'वंदे मातरम्…' ये सिर्फ दो शब्द नहीं हैं। आजादी की लड़ाई के दौर में यही आवाज अंग्रेजों के खिलाफ खड़े भारत की पहचान बन गई थी। लेकिन आजादी के करीब 80 साल बाद भी 'वंदे मातरम्' को लेकर राजनीति खत्म नहीं हुई है। आज फिर वही सवाल सामने है—वंदे मातरम् के पूरे अंतरे क्यों नहीं गाये जायें? कांग्रेस सिर्फ शुरुआती दो अंतरों पर ही क्यों अड़ी है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना पड़ेगा।
1905 में कैसे बना आंदोलन का नारा?
'वंदे मातरम्' बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना है। 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे गाया था। लेकिन 1905 में बंगाल विभाजन के बाद शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की बड़ी आवाज बन गया। 'वंदे मातरम्' का सीधा अर्थ है—मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। यहां मां से मतलब भारत माता यानी अपनी मातृभूमि से था। उस दौर में इसे सिर्फ एक गीत की तरह नहीं देखा जाता था। यह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़े होने और देश के लिए कुछ करने का जज्बा पैदा करने वाला नारा बन गया था।
विवाद क्यों हुआ?
पूरा 'वंदे मातरम्' कई अंतरों का है। पहले दो अंतरों में भारत की धरती, हरियाली, नदियों और मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन है। लेकिन बाद के अंतरों में देवी-स्वरूप और हिन्दू धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख आता है। इन्हीं हिस्सों को लेकर कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जतायी। उनका कहना था कि धार्मिक मान्यताओं की वजह से वे इन हिस्सों को गाने में सहज नहीं हैं। अब कांग्रेस के सामने मुश्किल यह थी कि आजादी की लड़ाई में ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक साथ कैसे रखा जाये।
1937 में कांग्रेस ने क्या फैसला लिया?
1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने तय किया कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वन्दे मातरम् के पहले दो अंतरे गाये जायें। यानी कांग्रेस ने पूरे गीत को खारिज नहीं किया था। उसने सार्वजनिक राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए पहले दो अंतरों को चुना था, ताकि धार्मिक आपत्तियों की वजह से विवाद न हो। उस समय देश गुलाम था और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी— अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सभी समुदायों को साथ रखना।
1950 में क्या हुआ?
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया गया। दोनों को देश के लिए विशेष सम्मान मिला। लेकिन पूरे वंदे मातरम् को हर सरकारी या राष्ट्रीय कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से गाने का फैसला नहीं हुआ।
15 अगस्त के बाद फिर गरमाया मामला
इस बार विवाद सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रहा। 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर सवाल उठाने शुरू कर दिये। इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को साफ कर दिया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाये जायेंगे और कांग्रेस 1937 के अपने फैसले पर कायम रहेगी। यानी कांग्रेस ने अपने पुराने रुख को फिर दोहरा दिया। इसके बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच बयानबाजी तेज हो गई।
अमित शाह ने बताया “देशविरोधी फैसला”
गुरुवार को गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले पर सीधा हमला बोला। अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले को 'देशविरोधी' बताया। उन्होंने कहा कि 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् को लेकर जो फैसला किया था, उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुधारने का काम किया है।
बीजेपी का सवाल
जब पूरा वंदे मातरम् आजादी की लड़ाई की विरासत है, तो कांग्रेस इसके पूरे स्वरूप को गाने से क्यों बच रही है? यहीं से बीजेपी इसे तुष्टिकरण और मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति से जोड़ रही है।
कांग्रेस का जवाब
कांग्रेस का कहना है कि वह कोई नया फैसला नहीं कर रही। वह सिर्फ 1937 में लिये गये अपने पुराने फैसले पर कायम है। कांग्रेस का तर्क है कि उस समय देश गुलाम था। आजादी की लड़ाई में हर धर्म और समुदाय को साथ रखना जरूरी था। इसलिए जिन हिस्सों पर धार्मिक आपत्ति थी, उन्हें राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस के मुताबिक यह फैसला किसी एक समुदाय को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया था। लेकिन, असली सवाल यहीं से शुरू होता है... क्या 1937 का भारत और 2026 का भारत एक जैसा है? 1937 में देश अंग्रेजों के कब्जे में था। आज भारत एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है। उस समय सबसे बड़ी जरूरत थी कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में ज्यादा से ज्यादा लोग एक साथ खड़े हों।
आज परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। तो सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या 89 साल पुराने उस फैसले को आज भी उसी तरह जारी रखने की जरूरत है? अगर परिस्थितियां बदल चुकी हैं, तो कांग्रेस अपने पुराने फैसले पर दोबारा विचार क्यों नहीं करती? क्या यह सच में मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति है?
अगर 1937 की परिस्थितियां आज नहीं हैं, तो कांग्रेस आज भी उसी फैसले पर क्यों कायम है? क्या यह सिर्फ इतिहास का सम्मान है? या फिर आज की राजनीति का दबाव भी इसमें शामिल है? इसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए। और इन दोनों के बीच सबसे बड़ा सवाल है— क्या 1937 का वह ऐतिहासिक समझौता 2026 में भी उतना ही जरूरी है? अगर कांग्रेस कहती है कि हां, तो उसे देश को समझाना होगा कि आज भी ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनके कारण वह सिर्फ दो अंतरे गाने के फैसले पर कायम है, और अगर परिस्थितियां बदल चुकी हैं, तो फिर पुराने फैसले की समीक्षा क्यों नहीं?
आखिर में...
वंदे मातरम् न बीजेपी की सम्पत्ति है और न कांग्रेस की। यह भारत की आजादी की लड़ाई की विरासत है। इसलिए इसे सिर्फ हिंदू-मुस्लिम विवाद या वोट बैंक की राजनीति तक सीमित करना भी ठीक नहीं होगा। लेकिन यह सवाल पूछना भी गलत नहीं है कि—
1937 में जिन परिस्थितियों को देखते हुए फैसला लिया गया था, क्या 89 साल बाद भी वही परिस्थितियां मौजूद हैं? बीजेपी इसे तुष्टिकरण बता रही है। कांग्रेस इसे ऐतिहासिक फैसला बता रही है, और देश के सामने सवाल है— क्या यह सिर्फ इतिहास का सम्मान है, या इसके पीछे आज की राजनीति भी है? शायद इसी वजह से 89 साल बाद भी वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है। यह आज भी इतिहास, राष्ट्रवाद, धर्म और राजनीति— चारों के बीच खड़ी एक बड़ी बहस है।
(लेखक के ये अपने विचार हैं)