Courtesy: The Financial Express
नयी दिल्ली। आज बात उस राशन की, जो चूल्हे तक पहुँचते-पहुँचते सियासत, तकनीक और इंसान की मजबूरी के बीच फँस जाता है। मुंशी प्रेमचंद ने 'गोदान' में लिखा था कि "मर्यादा की रक्षा पेट भरने से ज्यादा मुश्किल काम है।" आज यह बात राशन की उस नीली-पीली कतार में खड़े मजदूर को देखकर सच लगती है, जो हाथ में थैला लिए सिर्फ पाँच किलो अनाज नहीं, बल्कि अपने नागरिक होने की सनद और सम्मान मांग रहा होता है।
जब भी राशन वितरण में गड़बड़ी की बात आती है, तो सारा ध्यान स्वाभाविक रूप से पीडीएस दुकान पर जाकर टिक जाता है। लेकिन अगर पूरे सप्लाई चेन के नजरिये से देखें, तो वह डीलर इस विशाल तंत्र की सिर्फ अंतिम कड़ी है। वह कोई नीति-निर्माता नहीं, बल्कि तय नियमों, सीमित कमीशन और सीमित संसाधनों के बीच काम करने वाला एक आम निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति है, जिसके कंधे पर जन वितरण प्रणाली को सही तरीके से चलाने की चुनौतियाँ भी हैं।
साल 2015 के केन्द्रीय नियमों में डीलर का बेसिक मार्जिन प्रति क्विंटल 70 रुपये तय था, जिसे 1 अप्रैल 2022 से सामान्य राज्यों के लिए 90 रुपये और e-PoS संचालन के लिए 21 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। अब ज़रा ठंडे दिमाग से इसका हिसाब लगाइए। एक क्विंटल यानी सौ किलो अनाज तौलने पर डीलर के हाथ में बमुश्किल नब्बे से एक सौ दस रुपये आते हैं। अगर वह महीने में डेढ़ सौ क्विंटल अनाज बाँट भी दे, तो सकल कमाई बैठती है करीब पन्द्रह-सोलह हज़ार रुपये। इसी में से दुकान का किराया भरना है, बिजली का बिल देना है, 4G डेटा चलाना है और पल्लेदार की मजदूरी निकालनी है। ऊपर से सरकारी गोदाम से आनेवाली पचास किलो की बोरी में अगर रास्ते या नमी की वजह से एक-दो किलो अनाज पहले से कम निकले, तो उस घाटे की भरपाई भी सिस्टम डीलर की जेब से ही माँगता है। डीलर जनता को कम दे तो चोर कहलाता है, और अपनी जेब से भरे तो उसके खुद के घर का बजट बैठ जाता है।
फणीश्वरनाथ 'रेणु' ने 'मैला आंचल' में लिखा था कि सिस्टम की जकड़न में पिसते इंसान की चीख बाहर नहीं आती। 2018 में उत्तरप्रदेश में जब करीब 30 करोड़ रुपये का चर्चित खाद्यान्न घोटाला खुला, तो 43 जिलों में करीब एक लाख 86 हजार फर्जी लेनदेन पकड़े गए थे। तब यह बात सामने आयी कि असल खेल सिर्फ उस छोटे डीलर के स्तर पर नहीं था। विभाग के कंप्यूटर सिस्टम में गैर-हाजिर लाभार्थियों के पहचान नम्बर बदलकर डमी नम्बर चढ़ाये गए, अनाज का उठाव दिखाया गया और फिर असली डेटा रीस्टोर कर दिया गया। यह काम ब्लॉक और मुख्यालय स्तर के प्रशासनिक क्रेडेंशियल्स के बिना मुमकिन ही नहीं था। यानी चोरी जब डेटा की स्क्रीन पर हो रही हो, तो सड़क पर खड़े डीलर को अकेले कटघरे में खड़ा कर देना सिर्फ अपनी आँखें मूंदना है।
अब बात करते हैं दिल्ली से लेकर राज्यों तक गूंजने वाले उस तकनीकी दावे की, जिसे 'वन नेशन वन राशन कार्ड' यानी ONORC कहा गया। सरकारी फाइलों में यह व्यवस्था क्रांति जैसी दिखती है। अगस्त 2019 में चार राज्यों के क्लस्टर से शुरू होकर जून 2022 तक यह 36 राज्यों और केन्द्र—शासित प्रदेशों में लागू हुआ। जुलाई 2026 के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, देश में 221 करोड़ से अधिक पोर्टेबिलिटी ट्रांजैक्शन दर्ज हो चुके हैं। 100 प्रतिशत राशन कार्ड डिजिटाइज्ड हैं, लगभग 20.5 करोड़ कार्डों में से 99.8 प्रतिशत से अधिक आधार-सीडेड हैं, और देश की 5.5 लाख से अधिक दुकानों में 99.8 प्रतिशत e-PoS मशीनें चालू हैं। 98 प्रतिशत से ज्यादा वितरण बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन से हो रहा है। 2025-26 के बजट में पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के लिए 2.03 लाख करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान भी है।
आंकड़े शानदार हैं, पर ज़मीनी हकीकत की अपनी धूल और पसीना है। 221 करोड़ के इस विशाल आंकड़े में बड़ा हिस्सा एक ही राज्य के भीतर ब्लॉक बदलने वाले 'इन्ट्रा-स्टेट' लेनदेन का है, जबकि एक राज्य से दूसरे राज्य जाने वाले प्रवासी मजदूरों का अनुपात बेहद सीमित रहता है। जब बिहार या पूर्वी यूपी का मजदूर नोएडा या सूरत की किसी दुकान पर पहुँचता है, तो कई बार डीलर के पास अतिरिक्त बफर स्टॉक नहीं होता। फिर आता है बायोमेट्रिक का चक्कर। दिन भर सीमेंट और सरिया उठाने वाले मजदूर की हथेलियों की रेखाएँ घिस जाती हैं। मशीन लाल बत्ती जलाकर कह देती है: "ऑथेंटिकेशन फेल्ड।" सरकार के सख्त निर्देश हैं कि बायोमेट्रिक न मिलने पर किसी वास्तविक गरीब को खाली हाथ न लौटाया जाये और एक्सेप्शन रजिस्टर में एंट्री हो, लेकिन जमीनी स्तर पर तकनीकी खराबी का सारा गुस्सा उसी कतार में फूटता है।
भारत की इस पूरी राशन व्यवस्था को समझने के लिए सिर्फ यह देख लेना काफी नहीं है कि डीलर की जेब में कितना कमीशन जा रहा है। असल तस्वीर इससे कहीं ज्यादा बड़ी और पेचीदा है। हर राज्य ने अपनी जरूरत और भूगोल के हिसाब से अपना अलग रास्ता चुना है। उत्तरप्रदेश का इतना बड़ा नेटवर्क है कि उसे संभालना अपने आप में चुनौती है। मध्यप्रदेश 'राशन आपके ग्राम' के जरिये सीधे घर तक राशन पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। महाराष्ट्र तकनीक, पोर्टेबिलिटी और e-PoS पर जोर दे रहा है, तो केरल में सरकार खुद सप्लाई चेन का बड़ा खर्च उठाती है। उधर छत्तीसगढ़ में पंचायतें और महिलाओं के स्वयं सहायता समूह दुकानें संभाल रहे हैं, और तमिलनाडु में तो बिना किसी भेदभाव के सबको राशन देने वाला 'यूनिवर्सल PDS' मॉडल चल रहा है। यानी कहीं सारा दारोमदार तकनीक पर है, तो कहीं समाज और कम्युनिटी की भागीदारी पर; कहीं सरकार खुद अपनी जेब ढीली कर रही है। इसलिए सिर्फ यह कह देना सही नहीं होगा कि डीलर का कमीशन कम है, तो राशन की क्वालिटी खराब होगी ही। हाँ, कम मार्जिन से छोटे दुकानदार पर दबाव जरूर पड़ता है, लेकिन अनाज की चोरी, कालाबाजारी या वितरण की गड़बड़ी के पीछे गोदामों का हाल, ट्रांसपोर्ट की रूट प्लानिंग और अफसरों की निगरानी में ढिलाई जैसे कई और बड़े पेंच भी शामिल हैं।
कुल मिलाकर, PDS सुधार का असली मकसद सिर्फ राशन की दुकानों पर मशीनें लटकाना नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन को जवाबदेह, पारदर्शी और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना होना चाहिए। इसके लिए गोदाम से दुकान तक हर चरण पर इलेक्ट्रॉनिक तौल और डिजिटल रिकॉर्ड अनिवार्य करने होंगे, ताकि रास्ते की घटतौली का बोझ सीधे डीलर के मत्थे न मढ़ा जाए और हर दाने का साफ ऑडिट ट्रेल मौजूद रहे। इसके साथ ही, डीलर के मार्जिन को आज की महंगाई और असल परिचालन लागत के हिसाब से व्यावहारिक बनाना होगा, ताकि कोई भी उचित मूल्य दुकान आर्थिक तंगी के दबाव में गलत रास्ते की तरफ न ढकेली जाये। दूसरी तरफ, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को किसी भूखे की थाली की राह का पत्थर नहीं बनने दिया जा सकता। अगर उंगलियों के निशान मिट गए हैं, तो आइरिस स्कैनर और पारदर्शी एक्सेप्शन-हैंडलिंग नियम कागजों से उतरकर दुकानों पर अनिवार्य रूप से लागू दिखने चाहिए।
नयी तकनीकें, जैसे हाल ही में पायलट की गईं 'अन्नपूर्ति' ग्रेन एटीएम मशीनें, जो 35 सेकंड में 25 किलो अनाज निकालती हैं, भीड़-भाड़ और प्रवासी बाहुल्य शहरी इलाकों में वितरण को तेज और कम इंसानी दखलवाला जरूर बना सकती हैं, लेकिन इन्हें हर गाँव और पहाड़ी कस्बे का एकमुश्त इलाज मान लेना जल्दबाजी होगी। इसी तरह डिजिटल फूड वाउचर या सीबीडीसी जैसे भविष्य के प्रयोगों को भी ज़मीन पर उतारने से पहले डिजिटल पहुंच और बहिष्करण के जोखिमों की कसौटी पर कसना होगा।
समस्या की असल जड़ तकनीक की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की वह सोच है जो इंसान की भूख से ज्यादा सर्वर के सिग्नल पर भरोसा करने लगती है। समाधान ग्रेन एटीएम या e-PoS को खारिज करने में नहीं, बल्कि तकनीक के साथ एक मजबूत, संवेदनशील ह्यूमन बैकअप खड़ा करने में है - जहाँ डीलर को सम्मानजनक मेहनताना मिले, गोदाम से सही तौल आए, और मशीन के इनकार करने पर भी किसी गरीब की थाली खाली न रहे। दुष्यंत कुमार लिख गए थे - "कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।" 221 करोड़ का डेटा तभी अपनी सार्थकता साबित करेगा, जब व्यवस्था फाइलों की चमक से बाहर निकलकर कतार में खड़े उस आखिरी मजदूर की थाली की असली फिक्र करेगी।