BRICS: के 20 साल : भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक परीक्षा! मौका या चुनौती?

BRICS का विस्तार हुआ है, लेकिन क्या यह ज़्यादा असरदार बना है?

BRICS: के 20 साल : भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक परीक्षा! मौका या चुनौती?

Courtesy: Ministry of External Affairs, India.

Major General (Dr) S B Asthana, SM, VSM (Retd)

बनने के बीस साल बाद, BRICS दुनिया की आबादी और आर्थिक उत्पादन के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। फिर भी, इसके बढ़ते आकार ने इसके विरोधाभासों को भी उजागर किया है— चीन के आर्थिक दबदबे से लेकर डी-डॉलरलाइज़ेशन और पश्चिम के साथ सम्बंधों पर अलग-अलग नज़रिये तक। इसलिए, 2026 में भारत की अध्यक्षता एक अहम मोड़ पर आ रही है। यह विरोधाभास चौंकाने वाला है:

BRICS देशों के बीच आपसी व्यापार का अनुमान सिर्फ़ $700–800 बिलियन है, जबकि US और EU के साथ BRICS का व्यापार $5 ट्रिलियन से ज़्यादा है। तो क्या BRICS मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से टकराये बिना सच में रणनीतिक और आर्थिक कमज़ोरियों को कम कर सकता है? अपने हालिया विश्लेषण में, मैं इन बातों की पड़ताल कर रहा हूँ:
* 20 साल का BRICS और उसमें आया बदलाव
* भारत-चीन विरोधाभास
* डी-डॉलरलाइज़ेशन और आर्थिक दबाव
* BRICS सदस्य भारत से क्या उम्मीद करते हैं
* वाशिंगटन नयी दिल्ली से क्या उम्मीद करता है* भारत के लिए 'अध्यक्ष' से 'आर्किटेक्ट' (रूपरेखा बनानेवाला) बनने का मौका
"BRICS को एक ऐसे मंच के तौर पर विकसित होना चाहिए जो गुटबाज़ी की राजनीति में पड़े बिना रणनीतिक और आर्थिक मज़बूती को बढ़ाए।" और शायद भारत की BRICS रणनीति का मुख्य सिद्धांत यह होना चाहिए:
"BRICS को गैर-पश्चिमी होना चाहिए, लेकिन पश्चिमी-विरोधी नहीं।"
भारत की ताकत इस बात में है कि वह एक साथ BRICS, G—20, Quad, SCO, पश्चिम, रूस और व्यापक ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ सकता है।
मकसद सहयोग पर आधारित बहुध्रुवीयता (Co—operative multipolarity) होना चाहिए, न कि गुटों के बीच टकराव। नयी दिल्ली के सामने यही मौका है और यही परीक्षा भी है।

(लेखक Major General (Dr) S B Asthana, SM, VSM (Retd) रक्षा विषय के विशेष जानकार हैं। देश और अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों पर बराबर लिखते रहते हैं।)