Courtesy: A. I.
नयी दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के भीतर से एक ऐसी चिट्ठी बाहर आई है, जिसने देश के पूरे स्पेस सेक्टर का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। दरअसल बीते 4 सितंबर को इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन को एक साझा पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने इसरो की भविष्य में होने वाली भूमिका पर सवाल उठाये थे। इन संगठनों की तरफ से सीधा और बुनियादी सवाल पूछा गया कि क्या आने वाले समय में इसरा खुद रॉकेट बनाना बंद कर देगा? क्या अंतरिक्ष क्षेत्र में निजीकरण का कोई नया मॉडल लागू होने जा रहा है? यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर उसकी आधिकारिक स्थिति क्या है?
इसरो अध्यक्ष को लिखी गई इस चिट्ठी की असल कहानी की शुरुआत 21 अगस्त से होती है। उस दिन एक कार्यक्रम के दौरान इन स्पेस (IN-SPACe) के चेयरमैन पवन गोयनका ने एक सार्वजनिक मंच से कथित बयान दिया था। तब गोयनका ने अपने वक्तव्य में कहा था कि आगे चलकर इसरो खुद किसी लॉन्च व्हीकल यानी रॉकेट का निर्माण नहीं करेगा, बल्कि यह काम निजी उद्योग या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम संभालेंगे! उनके इस बयान को लेकर इसरो कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जब सरकार या अंतरिक्ष विभाग की ओर से इस तरह के किसी नीतिगत बदलाव का कोई आधिकारिक दिशानिर्देश सामने नहीं आया है। ऐसे में मीडिया मंचों से ऐसे बयान का क्या औचित्य है साथ ही ऐसी बयानबाजी से वैज्ञानिकों और तकनीकी स्टाफ के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई।
चिट्ठी की बात पर आगे बढ़ने से पहले इन स्पेस को भी समझ लेना जरूरी है। इन स्पेस यानी (इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर), भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के तहत एक स्वायत्त नोडल एजेंसी है। इस का गठन साल 2020 में किया गया था और यह संस्थान इसरो और निजी क्षेत्र के बीच एक सिंगल-विंडो एजेंसी के तौर पर काम करता है जिसमें यह गैर-सरकारी संस्थाओं को रॉकेट, सैटेलाइट निर्माण और लॉन्च जैसी अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति देना है। यही संस्था निजी कंपनियों को इसरो के बुनियादी ढांचे और अंतरिक्ष सुविधाओं का उपयोग करने की भी अनुमति देता है।
बहरहाल अब हम कर्मचारी संगठनों की उस चिट्ठी पर वापिस लौटते हैं। इस चिट्ठी को अगर ध्यान से पढ़ें, तो इसरो कर्मी, स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी के खिलाफ खड़े नहीं दिखते। उनकी मुख्य चिंता इसरो की संस्थागत पहचान और उसके कोर ढांचे को लेकर है। संगठनों का कहना है कि इसरो ने अंतरिक्ष में ऐसे आयाम रचे हैं जिसका लोहा अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय एजेंसियां मानती हैं ऐसे में कहीं आने वाले समय में इसरो की भूमिका निश्चित दायरे तक न रख दी जाय और इसे केवल रिसर्च एंड डेवलपमेंट तक सीमित संस्थान न बना दिया जाए। उनका कहना है कि रॉकेट डिजाइनिंग, उसके कलपुर्जों की टेस्टिंग, असेंबलिंग और फिर लॉन्च पैड से उसे अंतरिक्ष में भेजने का पूरा सिलसिला एक सिलसिलेवार प्रक्रिया है। इसरो के वैज्ञानिकों ने इसे दशकों की साधना और प्रयोगों के बाद हासिल किया है। अगर मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च ऑपरेशंस को पूरी तरह बाहर कर दिया जाएगा, तो इसरो के पास वास्तविक तकनीकी दक्षता और व्यावहारिक अनुभव की कमी हो सकती है।
चिट्ठी में दूसरा अहम बिंदु सार्वजनिक संसाधनों और टैक्सपेयर्स के पैसे का उठाया गया है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड हों, महेंद्रगिरि की लिक्विड प्रोपल्शन लैब, या फिर क्रायोजेनिक टेस्टिंग सुविधाएं। इन सबको देश के टैक्सपेयर्स के पैसों से छह दशकों में तैयार किया गया है। ऐसे में दशकों की मेहनत करके हासिल की गई इसरो की इस विरासत को निजी कंपनियों को सौंपने या साझा करने की जो भी प्रक्रिया बने, वह पूरी तरह नियम—सम्मत और पारदर्शी होनी चाहिये। निजी क्षेत्र को स्पेस सेक्टर में उतारने के पहले उनकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिये। इसके साथ ही चिट्ठी में मौजूदा वैज्ञानिकों, तकनीकी कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र और भविष्य की नियमित सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा गया है।
कर्मचारियों का यह पत्र जैसे ही सामने आया, इस पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा है कि निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के नाम पर डॉक्टर विक्रम साराभाई और प्रोफेसर सतीश धवन की ऐतिहासिक विरासत को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब संस्थान के भीतर काम करने वाले लोग ही अपनी भूमिका घटने को लेकर आवाज उठा रहे हैं, तो यह बात देश के सामने आनी चाहिए।
इस दौरान विवाद बढ़ते देख अब खुद इन-स्पेस प्रमुख डॉ. पवन गोयनका और अंतरिक्ष विभाग की तरफ से आधिकारिक सफाई भी आ गई है। गोयनका ने दो-टूक शब्दों में साफ किया है कि इसरो कर्मचारियों को अपने भविष्य को लेकर रत्ती भर भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि इसरो न केवल भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का आधार स्तंभ बना रहेगा, बल्कि इसका कद और दायरा पहले से कहीं ज्यादा बड़ा होगा। किसी भी सूरत में इसरो का निजीकरण नहीं किया जा रहा है।
वहीं इसरो ने अपने स्पष्टीकरण में इसे संस्था का निजीकरण नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का एक रणनीतिक कार्य-विभाजन बताया है। PSLV और SSLV जैसे साबित हो चुके रॉकेट्स के नियमित और व्यावसायिक उत्पादन का जिम्मा उद्योग जगत को सौंपा जा रहा है, ताकि देश की लॉन्चिंग क्षमता को कई गुना बढ़ाया जा सके। वहीं इसरो के वैज्ञानिकों का ध्यान रूटीन असेंबलिंग से हटाकर मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान, चंद्र अन्वेषण, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) जैसी भविष्य की अग्रणी तकनीकों पर केंद्रित किये जाने की बात भी कही गई है।
भारत सरकार ने 2020 में जो अंतरिक्ष सुधार शुरू किए थे, उनका मकसद वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी को 2 प्रतिशत से बढ़ाकर दहाई के आंकड़े तक ले जाना है। अधिकारियों के ताजा बयानों ने यह साफ करने की कोशिश की है कि निजी क्षेत्र की यह दौड़ इसरो की कीमत पर नहीं होगी। कर्मचारियों की चिंता और प्रशासन की सफाई के बीच का यह विमर्श यह भी साबित करता है कि बड़े नीतिगत बदलावों को अमलीजामा पहनाते वक्त संस्था के भीतर का भरोसा और पारदर्शी संवाद सबसे बुनियादी जरूरत हैं।