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आलेख : प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाषण में कोई नयी बात नहीं कही, जो कुछ कहा उसे वो भारत में भी अनेक बार दोहरा चुके हैं। मोहन भागवत के इस भाषण को छिपाने की कला के नमूने के रूप में देखा जाना चाहिए। मोहन भागवत की खासियत है कि वह जब भाषण देते हैं तो जो कुछ बताते हैं उससे अधिक छिपाते हैं।
सवाल यह है कि आरएसएस को हिन्दू संगठन के नाते जब कोई ग़लत और संविधान विरोधी चीज़, घटना, कार्रवाई, करप्शन, ग़लत सत्ता संचालन नज़र आये तो सवाल उठाने चाहिए या नहीं? यह कौन सा धर्म है जो ग़लत देखकर आंखें बंद कर लेता है। गलत देखकर आंखें बंद कर लेना धर्म नहीं अधर्म है।
क्या भारत में धार्मिक सद्भाव बचा हुआ है? स्वयं सरसंघचालक ने माना है, उन्होंने सन् 2018 से ही अन्य धर्मों के लोगों के साथ संवाद किया है। भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यह संविधान में लिखा है। सारे देश की इस पर मुहर लगी है। फिर इसे हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है? हिन्दू राष्ट्र बनाने का एजेंडा भारत विभाजन का एजेंडा है। भारत विभाजित हो, यह CIA -अमेरिका का एजेंडा है। वे यह भी चाहते हैं भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हो, अपराध तंत्र ताक़तवर बने। आश्चर्य की बात है लोकतंत्र पर आये खतरों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमज़ोर कर दिये जाने के ख़िलाफ़ मोहन भागवत ने एक भी वाक्य नहीं बोला। इससे पता चलता है मोहन भागवत अमेरिका में अमेरिका के ‘एंटी डेमोक्रेसी’, ‘एंटी मुसलिम’ एजेंडे को प्रच्छन्नतः समर्थन दे रहे थे! भारत में ‘एंटी मुसलिम’ और ‘एंटी डेमोक्रेसी' हवा चल रही है। इसके बारे में उनकी चुप्पी वही कहती है जो CIA चाहता है।
भारत में समस्या धर्म की नहीं है। असल समस्या है लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों पर हमले, नफ़रत और आर्थिक हमलों से जुड़ी घटनाएं एवं नये नागरिकता कानून और SIR की आड़ में नागरिकों पर हो रहे हमले। इन समस्याओं के कारण संघ और नरेन्द्र मोदी सरकार पर फासिस्ट होने का आरोप लगाया जा रहा है। इन ठोस समस्याओं को नज़रअंदाज़ करके हिन्दू धर्म पर खोखली बातें कहना, एक तरह से विषयान्तर करना है और भारत की सच्चाई को छिपाना है।
भारत की समस्या हिन्दू धर्म और उसकी समस्याएँ नहीं हैं। बुनियादी समस्या है संविधान और नागरिक अधिकारों पर बढ़ते हुए हमले, ईसाईयों और मुसलमानों पर हो रहे बर्बर हमले और इन हमलों में RSS से जुड़े संगठनों, सरकार और व्यक्तियों की घृणित भूमिका। इसके कारण ही सारी दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है। भारत की धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक इमेज ध्वस्त हो, यह अमेरिका-CIA चाहता है और यही काम RSS कर रहा है। यही वजह है, भारत की नष्ट हो रही इस इमेज को लेकर एक भी वाक्य मोहन भागवत ने नहीं कही। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ‘हर इंसान की गरिमा होती है। मनुष्य के बीच में कोई अंतर नहीं है।’ सवाल यह है, संघ इस पर आचरण क्यों नहीं करता?
हकीकत यह है कि भाजपा-संघ ने मीडिया का स्वतंत्र नेटवर्क तैयार किया है जो भारत में इंसान की गरिमा को नष्ट करने, इंसानियत की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने का अहर्निश काम कर रहा है, यह काम करने वालों को संघ-भाजपा हर महीने एक निर्धारित धनराशि भुगतान करता है। पेमेंट करके संगठित विभाजन अभियान चलाना सीआइए का ही मॅाडल है। मोहन भागवत ने कहा ‘सभी आस्थाएँ अंततः देवत्व की खोज की ओर ले जाती हैं।’ यह ग़लत समझ है। आधुनिक काल में आस्थाएँ देवत्व नहीं, मनुष्यत्व की खोज करती है। मध्यकाल में देवत्व की खोज करते थे।
विविधता की बनावट को राष्ट्र-राज्य की एकता का आधार मनुष्यत्व के विकास के लिए बनाया गया। विविधता असल में धार्मिक नहीं, राजनीतिक चीज़ है। धार्मिक विविधता तब तक नहीं रहेगी, जब तक राजनीतिक विविधता को हम स्वीकार नहीं करते। स्थिति यह है कि राजनैतिक विविधता को समानता के नज़रिये से RSS देखता ही नहीं है। बल्कि लिबरल और वाम विचारधारा पर वे आये दिन हमले करता रहता है।
मोहन भागवत का कहना कि विविधता हमारी जन्मजात एकता की सजावट है। इसकी रक्षा करनी होगी। सतह पर यह वक्तव्य निर्विवाद लगता है। हकीकत में यह निरर्थक वक्तव्य है। भारत में विविधता थी, लेकिन 'भेद संस्कृति’, ’जाति भेद’ और ‘धर्म भेद’ पर आधारित थी, असमानता इसका बुनियादी आधार था। असमानता के कारण ताक़तवर लोगों और वर्गों का सामाजिक-धार्मिक सम्बंधों और कार्यकलापों में वर्चस्व था। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, जो विभिन्न पुराणों-स्मृतियों आदि के माध्यम से भेद की संस्कृति को बनाये रखा गया। भेद की संस्कृति समानता का निषेध करती है। सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक असमानता की वकालत करती है। इसलिए विविधता के नाम पर जो सत्य है, वो है असमानता और भेद। इस पक्ष को बड़ी खूबसूरती से मोहन भागवत छिपा गये हैं।
हम भेदों के बीच जी रहे थे। असमानता में जी रहे है। पहली बार संविधान लागू होने के बाद भेद और असमानता के हिंदू सिस्टम को चुनौती दी गई और आधुनिक धर्मनिपेक्ष राष्ट्र-राज्य का जन्म हुआ। इसको नष्ट करके हिन्दू राष्ट्र बनाना जघन्य अपराध है।
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र-राज्य भारतीय समाज की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। संघ इसको ही नष्ट करना चाहता है। इस अर्थ में वह ‘एंटी नेशनल' है! मोहन भागवत हिन्दू राष्ट्र के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय माहौल बनाने के लिए प्रयासरत हैं और उसके ज़रिए जनता को भीड़ में तब्दील कर रहे हैं। इसको ही वे अपनी राष्ट्रीय ताक़त कह रहे हैं। राष्ट्रीय एकता का आधार हिन्दू धर्म या धर्म नहीं हो सकता। राष्ट्रीय एकता का आधार है लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता। इन दो के बिना विविधता, बहुलता, सद्भाव, समानता और सभ्यता आदि की रक्षा करना संभव नहीं है।
एक चीज़ है, वह है सत्य। सत्य उद्देश्य की चीज़ नहीं है बल्कि आचरण की चीज़ है। मोहन भागवत ग़लत कह रहे हैं कि सत्य उद्देश्य की चीज़ है। सत्य यह है कि अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ नफरती कैम्पेन चल रहा है। लेकिन मोहन भागवत के साथ सात बार बैठने के बावजूद अल्पसंख्यकों के नेताओं को उनसे इसे बंद करने का आश्वासन नहीं मिला।
वर्तमान में केन्द्र और राज्य सरकारें इसे बंद करने में असफल रही हैं। स्थिति यह है कि भाजपा के मुख्यमंत्री और संघ के टॅाप नेता आये दिन हेट कैम्पेन संचालित करते रहते हैं।
मोहन भागवत ने कहा कि ‘इसका उद्देश्य नीतियों और राजनीति को प्रभावित करना भी है, जिसमें युद्धों को रोकने के प्रयास भी शामिल हैं, इसलिए, हम राजनीति को प्रभावित करना चाहते हैं। लेकिन हम उनसे शुरुआत नहीं कर सकते। राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है। जहाँ मैं और मेरा, वहाँ कोई हल नहीं। हम और हमारा समाधान है।”
राजनीति जब स्वार्थ का खेल बन गई है तो फिर भाजपा के ज़रिये राजनीति क्यों की जा रही है? ‘हम’ और ‘हमारा’ जब भी कहेंगे तो ‘तुम’ और ‘तु्म्हारा’ का विभाजन सामने आयेगा। धर्मों के बीच प्रतिस्पर्धा सामने आयेगी। प्रतिस्पर्धा आयेगी तो नफ़रत भी सामने आयेगी। धर्म का विकास, बिना विभाजन के संभव नहीं है। धर्म के आधार पर सभी सम्प्रदायों को एक ही झंड़े तले लाना संभव नहीं है। देवत्व एक है तो हिन्दुओं में अलग सम्प्रदाय क्यों हैं? जैन, बौद्ध, सिख धर्म का अलग जन्म क्यों हुआ? जरूर ही हिन्दू धर्म में कोई बात ऐसी है जिसके कारण इन धर्मों का उदय हुआ। इसलिए ‘देवत्व’ एक है, भगवान एक है..., कहकर वैचारिक मतभेदों को छिपाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।
भगवान एक है तो मोहन भागवत कभी बौद्ध/इस्लाम/सिख/ईसाई धर्म के अनुसार आचरण करने की बात क्यों नहीं करते हैं? RSS ने अपने हिन्दुत्व के नज़रिये का आधार परंपरागत हिन्दू धर्म को माननेवालों- स्वामी विवेकानन्द, अरविन्दो, दयानन्द सरस्वती आदि को भी नहीं बनाया। न ही वैष्णव सम्प्रदाय, शंकराचार्य सम्प्रदाय, माधवाचार्य और रामानुजाचार्य, यहां तक वैदिक धर्म को भी संघ का वैचारिक आधार बनाया। यही वजह है कि उसका भारत की हिन्दू धर्म परम्परा से कोई सम्बंध नहीं है।
विचारधारा के रूप में उसके हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का आधार है फासिस्ट राजनीति और उसके विचारक। यही वजह है वे मीठी भाषा, गोलमोल भाषा, अर्थहीन भाषा बोलते हैं और आचरण में असत्य उनका सबसे बड़ा मंत्र है तथा हिंसा और नफ़रत सबसे प्रभावशाली औज़ार हैं। भारत में किसी भी हिन्दू सम्प्रदाय ने हथियारबंद गिरोह, नफरती गिरोह, सत्ता प्रेमी, करप्शन प्रेमी गिरोह पैदा नहीं किये और न ही इनका निर्माण किया। इस नज़रिये से देखें तो आरएसएस बहुत ही ख़तरनाक संगठन नज़र आयेगा। शिक्षा और आपदा में काम तो ये लोग अपने असली चरित्र को छिपाने के लिए करते हैं।
(आलेख में वर्णित तथ्यों का 'द फ्रीलांस मीडिया' समर्थन नहीं करता है। आलेख में व्यक्त विचार लेखक प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी के अपने हैं।)