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भारतीय राजनीति की ‘आयरन लेडी’ इन्दिरा गांधी का पूरा जीवन ही एक ऐसा महाकाव्य है, जिसमें जीत की गूंज भी है और विवादों के गहरे सा भी। इतिहास की किताबों में अक्सर इन्दिरा गांधी और आपातकाल के दौर को एक ही चश्मे से देखा जाता है, लेकिन उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम इतने जटिल थे कि देश के कई कद्दावर नेता भी उनके फैसलों के साथ खड़े नजर आये थे। इनमें से सबसे अनूठा और चौंकाने वाला नाम था— शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का।
यह केवल एक प्रधानमंत्री की नहीं; यह उस दौर की परिस्थितियों, अनकहे समझौतों, राष्ट्रहित के अलग-अलग दृष्टिकोणों और एक मजबूत महिला के नेतृत्व की वह मुकम्मल दास्तान है, जिसने भारत की तकदीर को हमेशा के लिए बदल दिया।
आनंद भवन का सन्नाटा और बचपन का अकेलापन
इन्दिरा प्रियदर्शिनी का जन्म 19 नवम्बर 1917 को इलाहाबाद के आलीशान ‘आनंद भवन’ में हुआ था। बाहर से देखने पर यह घर वैभव और राजनीति का केन्द्र था, लेकिन भीतर एक नन्ही बच्ची के लिए सिर्फ गहरा सन्नाटा था। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू चौबीसों घंटे देश को आजाद कराने की रणनीतियों में व्यस्त रहते थे। आये दिन घर पर पुलिस के छापे पड़ते थे और कीमती सामान कुर्क कर लिया जाता था।
इस माहौल में इन्दिरा की मां, कमला नेहरू, अक्सर बीमार रहने लगीं। मां की बीमारी और पिता की जेल यात्राओं ने छोटी सी इन्दिरा को वक्त से पहले परिपक्व और गंभीर बना दिया। गुड़ियों से खेलने की उम्र में उन्होंने अपने खिलौनों की एक 'कोर्ट' बनायी थी, जहाँ वह अंग्रेजों को सजा सुनाया करती थीं। जब वो मात्र आठ वर्ष की थीं, तब उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने के लिए बच्चों की एक अनोखी 'बाल वानर सेना' खड़ी कर दी। यह सेना आंदोलनकारियों के गुप्त संदेश एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाती थी और धरनों के दौरान पानी और भोजन की व्यवस्था करती थी।
'गूंगी गुड़िया' का सत्ता के शिखर तक का सफर
1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद देश की कमान लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में आयी। शास्त्री जी ने इन्दिरा गांधी की प्रशासनिक समझ को देखते हुए उन्हें अपने मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री का पद सौंपा। लेकिन जनवरी 1966 में ताशकंद में शास्त्री जी के अचानक और रहस्यमय निधन ने देश के सामने नेतृत्व का बड़ा संकट खड़ा कर दिया।
कांग्रेस के भीतर 'सिंडिकेट' कहे जाने वाले पुराने और कद्दावर नेताओं (जैसे के. कामराज और एस.के. पाटिल) को लगा कि जवाहरलाल नेहरू की बेटी को प्रधानमंत्री बनाकर वे पर्दे के पीछे से सरकार चला सकेंगे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने संसद में इन्दिरा की शुरुआती झिझक को देखकर उन्हें व्यंग्य में 'गूंगी गुड़िया' कहा था। सिंडिकेट को पूरा भरोसा था कि इस 'गुड़िया' की चाबी उनके हाथ में रहेगी।
लेकिन इन्दिरा गांधी ने बहुत जल्द ही सबको हैरान कर दिया। 1969 में जब राष्ट्रपति चुनाव के समय सिंडिकेट के साथ उनका मतभेद चरम पर पहुंचा, तो उन्होंने अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय स्वतंत्र उम्मीदवार वी.वी. गिरि का समर्थन कर दिया। इसके बाद कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई। इन्दिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization of 14 Banks) किया और राजा-महाराजाओं को मिलने वाले 'प्रिवी पर्स' (शाही भत्ते) को समाप्त कर दिया। इन क्रांतिकारी और समाजवादी फैसलों ने उन्हें रातों-रात गरीबों और आम जनता का मसीहा बना दिया। 1971 के आम चुनाव में उनका दिया गया नारा 'वे कहते हैं इन्दिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ' देश के कोने-कोने में गूंज उठा और वो प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आयीं।
इन्दिरा गांधी के राजनीतिक सफर को गहराई से समझने के लिए बैंकों का ऐतिहासिक राष्ट्रीयकरण और उनके छोटे बेटे संजय गांधी की भूमिका को जानना सबसे ज़रूरी है। ये दो ऐसे विषय हैं जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया। 1960 के दशक के अंत में भारत के लगभग सभी बड़े बैंक कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों और बड़े व्यापारिक घरानों (टाटा, बिड़ला आदि) के नियंत्रण में थे। ये बैंक केवल बड़े व्यापारियों को ही लोन देते थे। देश के किसानों, छोटे दुकानदारों और गरीबों के लिए बैंक के दरवाजे बंद थे। कृषि क्षेत्र (Agriculture) को कुल लोन का मात्र 2 प्रतिशत हिस्सा ही मिल पाता था। कांग्रेस के भीतर पुराने और रूढ़िवादी नेताओं का गुट (सिंडिकेट), जिसके अगुआ तत्कालीन वित्तमंत्री मोरारजी देसाई थे, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के सख्त खिलाफ थे। इन्दिरा गांधी समझ चुकी थीं कि अगर उन्हें अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी है, तो उन्हें समाजवाद का रास्ता अपनाना होगा। इसके लिए उन्हें कई कड़े फैसले लेने पड़े। जुलाई 1969 में इन्दिरा जी ने मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया, जिससे नाराज होकर देसाई ने इस्तीफा दे दिया। 19 जुलाई 1969 की रात को, बिना किसी ढोल-नगाड़े के, इन्दिरा गांधी ने एक अध्यादेश (Ordinance) पर हस्ताक्षर किये। इसके तहत देश के 14 सबसे बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, यानी वे सरकारी बैंक बन गए। इन 14 बैंकों के पास देश का करीब 85 प्रतिशत पैसा था। इसका देश पर गहरा असर हुआ।
बैंकों की शाखाएं शहरों से निकलकर दूर-दराज के गांवों में खुलीं। भारतीय किसानों को पहली बार फसलों, ट्रैक्टर और खाद के लिए आसानी से लोन मिलना शुरू हुआ, जिससे देश अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना। इस फैसले से आम जनता के मन में यह संदेश गया कि इन्दिरा गांधी अमीरों के खिलाफ और गरीबों के हक में लड़ रही हैं। इसी फैसले ने 1971 के चुनाव में उनके 'गरीबी हटाओ' के नारे की नींव रखी। कहा जाता है, इन्दिरा गांधी ने यह फैसला अपने छोटे बेटे संजय गांधी की सलाह पर ली थी। संजय गांधी कभी किसी सरकारी पद पर नहीं रहे, लेकिन 1975 से 1977 के आपातकाल (Emergency) के दौरान वह देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन चुके थे। संजय गांधी की दिलचस्पी राजनीति से ज्यादा कारों और इंजीनियरिंग में थी। वह भारत में एक ऐसी 'जनता कार' बनाना चाहते थे जो सस्ती हो और जिसे हर मध्यमवर्गीय परिवार खरीद सके। इसके लिए 'मारुति लिमिटेड' कम्पनी बनायी और सरकार ने उन्हें जमीन एवं लाइसेंस दिये। हालांकि, यह परियोजना (प्रोजेक्ट) उस समय सफल नहीं हो पायी और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे, जिसने इन्दिरा सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाया।
जब 1975 में आपातकाल लागू हुआ, तो संजय गांधी ने परोक्ष तौर पर पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली। मुख्यमंत्री, मंत्री और बड़े अफसर इन्दिरा जी से मिलने से पहले संजय गांधी के सामने कतार में खड़े होते थे। उन्होंने 'युवा कांग्रेस' को अपना मुख्य हथियार बनाया। उन्होंने देश के विकास के लिए एक '5-सूत्रीय कार्यक्रम' (5-Point Programme) चलाया, जिसके इरादे तो अच्छे थे, लेकिन उन्हें लागू करने का तरीका बेहद क्रूर और तानाशाही था। जबरन नसबंदी (Forced Sterilization) भी उन्हीं में था। देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए संजय गांधी ने तेजी से नसबंदी का अभियान चलाया। पुलिस और प्रशासन को टारगेट दिये गए। नतीजा यह हुआ कि नौजवानों, कुँवारे लड़कों और बुजुर्गों को भी पकड़-पकड़कर जबरन नसबंदी सेंटरों में ले जाया गया। इससे जनता के भीतर सरकार के प्रति खौफ और नफरत पैदा हो गई। इसके अलावा दिल्ली को खूबसूरत और झुग्गीमुक्त बनाने के उद्देश्य से संजय गांधी के निर्देश पर अप्रैल 1976 में पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में हजारों गरीबों के आशियाने बुलडोजर से ढहा दिये गए। जनता ने विरोध किया, तो पुलिस ने गोलियां चलायीं, जिसमें कई लोग मारे गए। उनके कार्यक्रम में पेड़ लगाना और दहेज प्रथा को रोकना भी शामिल था, जो सकारात्मक कदम थे, लेकिन तानाशाही रवैये के कारण ये भी विवादों में घिरे रहे। संजय गांधी के इन कड़े और विवादित फैसलों के कारण ही 1977 के चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। खुद संजय गांधी भी चुनाव हार गए।
23 जून 1980 को नयी दिल्ली में एक स्टंट विमान (Saffire 2-seat plane) उड़ाते समय एक हवाई दुर्घटना में संजय गांधी की मौत हो गई। इस हादसे ने इन्दिरा गांधी को भीतर से पूरी तरह तोड़ दिया। संजय न केवल उनके बेटे थे, बल्कि उनके सबसे भरोसेमंद राजनीतिक सलाहकार भी थे। उनकी मौत के बाद ही इन्दिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।
1971 का युद्ध, वैश्विक दबाव और 'दुर्गा' का अवतार
इन्दिरा गांधी के जीवन का सबसे गौरवशाली अध्याय साल 1971 में लिखा गया। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना जनरल याह्या खान के नेतृत्व में वहां के बंगाली नागरिकों पर भयानक जुल्म ढा रही थी। लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत की सीमाओं में घुस रहे थे, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा था।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर खुलकर पाकिस्तान का साथ दे रहे थे। निक्सन व्यक्तिगत रूप से इन्दिरा गांधी को नापसंद करते थे और उन्होंने उनके लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल भी किया था। लेकिन इन्दिरा इन वैश्विक धमकियों से नहीं डरीं। उन्होंने तुरंत सोवियत संघ (रूस) के साथ एक ऐतिहासिक सुरक्षा संधि की, जिसने अमेरिका और चीन के हाथ बांध दिये।
जब दिसम्बर 1971 में पाकिस्तान ने भारत पर हवाई हमला किया, तो इन्दिरा गांधी ने भारतीय सेना को खुली छूट दे दी। उन्होंने सैम मानेकशॉ जैसे कुशल सेनापति पर पूरा भरोसा जताया। जब अमेरिका ने भारत को डराने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपना परमाणु हथियारों से लैस 'सातवां बेड़ा' (Seventh Fleet) भेजा, तब भी इन्दिरा के चेहरे पर शिकन तक नहीं आयी। मात्र 13 दिनों के भीतर भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया। इतिहास के सबसे बड़े सैन्य आत्मसमर्पण के साथ 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने घुटने टेक दिये और दुनिया के नक्शे पर एक नये राष्ट्र 'बांग्लादेश' का जन्म हुआ। इस अभूतपूर्व जीत के बाद विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में उन्हें 'दुर्गा' का अवतार कहकर सम्मानित किया।
आपातकाल का काला साया और बालासाहेब ठाकरे का अप्रत्याशित समर्थन
1971 की ऐतिहासिक जीत के बाद देश में आर्थिक हालात बिगड़ने लगे। मानसून की विफलता, तेल का संकट और बेरोजगारी के कारण जनता में असंतोष बढ़ने लगा। गुजरात और बिहार से छात्र आंदोलन शुरू हुए, जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने किया। जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया और सेना एवं पुलिस से भी सरकार के आदेश न मानने की अपील की। इसी बीच 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसले में इन्दिरा गांधी के 1971 के चुनाव को तकनीकी आधार पर अमान्य घोषित कर दिया और उन पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
सत्ता हाथ से जाने के खतरे और देश में मची चौतरफा अराजकता को देखते हुए, इन्दिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आापातकाल (Emergency) लागू कर दिया। सभी मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिये गए, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे तमाम बड़े विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूँस दिया गया और अखबारों पर सख्त सेंसरशिप लगा दी गई।
जहाँ एक तरफ पूरा विपक्ष और बुद्धिजीवी वर्ग इस फैसले को भारतीय लोकतंत्र की हत्या मान रहा था, वहीं मुम्बई में एक ऐसी घटना घट रही थी जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। प्रखर राष्ट्रवादी और कट्टर कांग्रेसी विरोधी माने जाने वाले शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने इन्दिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपातकाल का खुलकर समर्थन किया।
बालासाहेब ठाकरे का मानना था कि उस समय देश में जिस तरह की अराजकता, अनुशासनहीनता, और निरंतर होनेवाली हड़तालों का माहौल था, उसे रोकने के लिए ऐसे ही सख्त और कड़े कदमों की सख्त आवश्यकता थी। ठाकरे की राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा में 'राष्ट्रहित' और 'देश की एकता-अखंडता' हमेशा सर्वोपरि थी। उन्हें साफ लग रहा था कि तत्कालीन विपक्षी आंदोलनों और ट्रेड यूनियनों की लगातार हड़तालों के कारण देश भीतर से खोखला हो रहा था और देश के टूटने की नौबत आ गई थी।
ठाकरे का मानना था कि उस दौर में केवल इंदिरा गांधी ही एक ऐसी राजनेता थीं, जिनमें देश को बिखरने से बचाने और इतने कड़े एवं अप्रिय फैसले लेने का अद्भुत साहस था। आपातकाल के दौरान जब ट्रेनों का समय पर चलना शुरू हुआ, सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी वक्त पर आने लगे, और जबरन होनेवाले बंद एवं दंगों पर पूरी तरह अंकुश लग गया, तो बालासाहेब ने इसे 'प्रशासनिक अनुशासन और व्यवस्था' की जीत माना। उन्होंने खुले मंच से कहा कि देश को इस समय लोकतंत्र के ढोंग से ज्यादा अनुशासन की जरूरत है। हालांकि, उनके इस फैसले के कारण शिवसेना के कई सहयोगी उनसे नाराज भी हुए, लेकिन ठाकरे अपने इस स्टैंड पर अडिग रहे।
पतन, आत्ममंथन और फिर से धमाकेदार वापसी
19 महीने के दमन—चक्र के बाद, जनवरी 1977 में इन्दिरा गांधी ने अचानक आपातकाल हटाने और चुनाव कराने की घोषणा की। उन्हें खुफिया एजेंसियों ने रिपोर्ट दी थी कि जनता उनके काम से खुश है और वो दोबारा जीतेंगी। लेकिन यह उनका सबसे गलत आकलन साबित हुआ। जनता के भीतर आपातकाल की ज्यादतियों, जबरन नसबंदी और सेंसरशिप को लेकर भारी गुस्सा भरा हुआ था।
1977 के आम चुनाव में जनता ने कांग्रेस को बुरी तरह उखाड़ फेंका। इन्दिरा गांधी खुद अपनी पारम्परिक सीट रायबरेली से चुनाव हार गईं और उनके बेटे संजय गांधी भी अमेठी से हार गए। केन्द्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी, जिसके प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बने।
कई लोगों ने मान लिया था कि इन्दिरा गांधी का राजनीतिक करियर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। लेकिन वो हार माननेवाली महिला नहीं थीं। जनता पार्टी की सरकार वैचारिक अंतर्विरोधों और आपसी कलह से जूझ रही थी। वे देश चलाने के बजाय सिर्फ इन्दिरा गांधी को जेल भेजने और उनसे बदला लेने की राजनीति में व्यस्त हो गए। जब इन्दिरा को एक बार गिरफ्तार किया गया, तो जनता की सहानुभूति फिर से उनके साथ हो गई।
इन्दिरा गांधी ने इसी समय बिहार के बेलछी गाँव का दौरा किया, जहाँ दलितों पर भयानक अत्याचार हुआ था। बाढ़ के पानी के बीच वो हाथी पर सवार होकर उस सुदूर गाँव तक पहुँचीं। इस एक घटना ने देश को संदेश दे दिया कि संकट के समय केवल वही जनता के साथ खड़ी हो सकती हैं। नतीजा यह हुआ कि 1980 के मध्यावधि चुनाव में जनता पार्टी बिखर गई और देश की जनता ने एक बार फिर भारी बहुमत के साथ इन्दिरा गांधी को सत्ता की कुर्सी सौंप दी।
पंजाब का संकट और नियति का अंतिम फैसला
इन्दिरा गांधी का दूसरा कार्यकाल उनके पहले कार्यकाल से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और अशांत था। इस बार संकट देश की सीमाओं पर नहीं, बल्कि देश के भीतर—पंजाब में था। जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख अलगाववादी एक अलग देश 'खालिस्तान' की मांग कर रहे थे। धीरे-धीरे इन आतंकवादियों ने अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) पर कब्जा कर लिया और उसे भारी हथियारों के अभेद्य किले में तब्दील कर दिया।
देश की संप्रभुता और अखंडता दांव पर लगी थी। कई महीनों की हिचकिचाहट के बाद, इन्दिरा गांधी ने एक बेहद कठिन और कठोर निर्णय लिया। जून 1984 में उन्होंने भारतीय सेना को स्वर्ण मंदिर परिसर से आतंकवादियों को बाहर निकालने का आदेश दिया, जिसे 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' का नाम दिया गया। इस सैन्य कार्रवाई में भिंडरावाले मारा गया और मंदिर को उग्रवादियों से मुक्त करा लिया गया, लेकिन इस प्रक्रिया में अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुँचा और कई निर्दोष श्रद्धालुओं की भी जान गई। इस घटना ने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं को बहुत गहरी ठेस पहुँचाई।
इस फैसले के बाद खुफिया एजेंसियों (IB और RAW) ने इन्दिरा गांधी को आगाह किया था कि उनकी जान को गंभीर खतरा है और उनके सुरक्षा दस्ते से सभी सिख अंगरक्षकों को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए। लेकिन इन्दिरा ने इस फाइल पर लाल स्याही से लिखा—"No, we are a secular nation." (नहीं, हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं)। वे किसी भी कीमत पर यह संदेश नहीं देना चाहती थीं कि वो किसी एक समुदाय के खिलाफ हैं।
अमर शहादत और अमिट विरासत
31 अक्टूबर 1984 की वह सुबह दिल्ली के 1— सफदरजंग मार्ग (Safdarjung Road) स्थित आवास पर रोज जैसी ही थी। इन्दिरा गांधी एक प्रसिद्ध ब्रिटिश पीटर उस्टिनोव को इंटरव्यू देने के लिए अपने बंगले से सटे दफ्तर की ओर पैदल बढ़ रही थीं। जैसे ही वो बागीचे के रास्ते से गुजरीं, वहां तैनात उनके अपने ही दो सिख अंगरक्षकों—बेअंत सिंह और सतवंत सिंह—ने अपनी सर्विस गन तान दीं। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा परिसर गूंज उठा। बेअंत सिंह ने अपनी पिस्तौल से तीन गोलियां चलायीं और सतवंत सिंह ने अपनी स्टेनगन की पूरी मैगजीन (25 से ज्यादा गोलियां) उनके शरीर में उतार दीं। इन्दिरा जी वहीं जमीन पर गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत एम्स (AIIMS) अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। अपनी मृत्यु से ठीक एक दिन पहले, 30 अक्टूबर को भुवनेश्वर में दिये अपने आखिरी भाषण में उन्होंने मानो अपनी नियति लिख दी थी:
"मैं आज यहाँ हूँ, कल शायद यहाँ न रहूँ... लेकिन मेरे खून की एक-एक बूंद इस देश को मजबूत करने और इसे जीवित रखने में योगदान देगी।"
इन्दिरा गांधी का जीवन एक ऐसा विरोधाभास था, जिसे शब्दों में समेटना नामुमकिन है। वह एक ऐसी नेता थीं जिन्होंने भारत को परमाणु शक्ति (1974 का पोखरण परीक्षण) बनाया, हरित क्रांति (Green Revolution) के जरिये देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर किया, अंतरिक्ष में पहला भारतीय (राकेश शर्मा) भेजा, लेकिन साथ ही देश पर आपातकाल का दाग भी लगाया। उनका पूरा जीवन साहस, समर्पण, और अंतिम सांस तक देश की अखंडता के लिए लड़ने की एक अमर और अद्वितीय गाथा है।