भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं लाल बहादुर शास्त्री

भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं लाल बहादुर शास्त्री

भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं लाल बहादुर शास्त्री

शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ नहीं हो पा रहा हूँ। यद्यपि शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूँ। संसद में रेल दुर्घटना पर लम्बी बहस का जवाब देते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने जब यह कहा होगा, उस समय किसी को उम्मीद नहीं रही होगी कि वह एक दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन, पंडित नेहरू को उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति पर भरोसा था। यही वजह रही कि जब पंडित नेहरू गंभीर रूप से बीमार पड़े तो लाल बहादुर शास्त्री ने बिना मंत्रालय का मंत्री रहते उन सभी कामों पर नजर रख रहे थे जिन्हें पंडित नेहरू देखा करते थे। उनकी मौत के बाद उत्तराधिकारी भी वही बने और पंडित नेहरू के सपनों का भारत बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। लाल बहादुर शास्त्री के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। ‘जय जवान, जय किसानका नारा देकर उन्होंने कृषि-प्रधान देश भारत के किसानों को हरित क्रान्ति के लिए और भारतीय सेनाओं के हौसले को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1965 के भारत-पाक युद्ध में उनके दृढ़ नेतृत्व ने देश को नयी दिशा दी।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

उत्तरप्रदेश में वाराणसी से लगभग सात मील दूर मुगलसराय के एक कायस्थ परिवार में 2 अक्टूबर 1904 को जन्में लाल बहादुर शास्त्री के पिता मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव अध्यापक थे। उनकी माता का नाम रामदुलारी देवी था। लाल बहादुर शास्त्री डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ वाराणसी के ही समीप मिर्जापुर स्थित अपने पिता के घर जाकर बस गयीं। उस छोटे-से शहर में लाल बहादुर की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही, लेकिन गरीबी की मार पड़ने के बावजूद उनका बचपन पर्याप्त रूप से खुशहाल बीता। मिर्जापुर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें वाराणसी में चाचा के साथ रहने के लिए भेज दिया गया था। वहाँ उन्होंने काशी विद्यापीठ में पढ़ाई की। 1925 में दर्शन और मानविकी में स्नातक होने के बाद उन्हें ‘शास्त्री की उपाधि दी गयी। इसके बाद उन्होंने जातिसूचक शब्द ‘श्रीवास्तव हमेशा के लिए त्याग दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री जोड़ लिया। ‘काशी  विद्यापीठ’ ब्रिटिश शासन की अवज्ञा में स्थापित राष्ट्रीय संस्थानों में से एक था। यहाँ रहते उनका महान विद्वानों एवं देश के राष्ट्रवादियों से सम्पर्क बढ़ा और वह उनके प्रभाव में आये। 1927 में उनकी शादी मिर्जापुर में ललिता देवी से हो गयी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। दहेज के रूप में वह इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।

ईमानदारी के मिसाल

लाल बहादुर शास्त्री अपनी अटूट सादगी और असाधारण ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कभी भी अपने पद का गलत फायदा नहीं उठाया और हमेशा नैतिक मूल्यों को सबसे ऊपर रखा। प्रधानमंत्री रहते उन्होंने निजी काम के लिए कभी सरकारी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया। परिजनों के अनुरोध पर निजी काम के लिए उन्होंने खुद की कार खरीदने की सोची। लेकिन, इसके लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से पाँच हजार रुपये का कर्ज (Loan) लोन लिया था। शास्त्री जी के आकस्मिक निधन के बाद बैंक ने बचा हुआ कर्ज माफ करना चाहा, पर उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री ने अपनी पारिवारिक पेंशन के पैसों से बैंक का पूरा कर्ज चुकाया।

रेल-मंत्री बनने के बाद जब वह बनारस आये तो रेलवे स्टेशन पर उनके स्वागत में लोगों की भीड़ देख उनकी माँ ने इसका कारण जानना चाहा, तब उन्होंने बताया कि वो रेल विभाग में काम करते हैं। ऐसा कहने के पीछे उनकी मंशा यह रही थी कि ममतामयी होने की वजह से उनकी माँ अनजाने में कहीं किसी की गलत पैरवी कर दें। रेल-मंत्री रहते हुए जब एक बड़ा रेल हादसा हुआ, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसी तरह स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान जब वह जेल में थे तो उनकी बेटी के बहुत बीमार होने पर उन्हें कुछ दिनों की पैरोल पर छोड़ा गया। बेटी के निधन और अंतिम संस्कार के तुरंत बाद, तय समय पर शास्त्री जी खुद वापस जेल लौट आये थे।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

लाल बहादुर शास्त्री जब ग्यारह वर्ष के थे, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था। गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों से जब आह्वान किया था, लाल बहादुर शास्त्री सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया। इस निर्णय ने उनकी माँ की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। एक बार मन बना लेने के बाद लाल बहादुर अपना निर्णय कभी नहीं बदला करते थे। उन्हें जाननेवाले अच्छी तरह जानते थे कि बाहर से विनम्र दिखनेवाले लाल बहादुर अंदर से चट्टान की तरह दृढ़ थे। 1921 में असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा। इसके बाद, उन्होंने नमक सत्याग्रह (1930) और भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) सहित कई आन्दोलनों में हिस्सा लिया और अपने जीवन के लगभग 9 साल जेल में बिताये। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया।

राजनीतिक सफर और उपलब्धियाँ

आजादी के बाद जब कांग्रेस सत्ता में आयी, उससे पहले ही स्वतंत्रता संग्राम के नेता विनीत एवं नम्र लाल बहादुर शास्त्री के महत्व को समझ चुके थे। 1946 में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो शास्त्री जी को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया। उन्हें अपने गृह-राज्य उत्तरप्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वह गृहमंत्री पद पर भी आसीन हुए। उत्तरप्रदेश के पुलिस और परिवहन मंत्री भी बने। कड़ी मेहनत करने की उनकी क्षमता एवं उनकी दक्षता उत्तरप्रदेश में एक लोकोक्ति बन गयी। 1951 में उन्हें नयी दिल्ली बुला लिया गया। दिल्ली में उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला। रेलमंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृहमंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। 1956 में एक बड़ी रेल दुर्घटना, जिसमें कई लोगों की जान गयी थी, की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की थी। नेहरू ने कहा कि उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि जो कुछ हुआ इसके लिए वो जिम्मेदार हैं, बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी।

प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को उन्होंने भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी का कार्यकाल चुनौतियों से भरा था, लेकिन उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से देश को उबारा। 1965 में जब भारत भयंकर सूखे और खाद्य संकट से जूझ रहा था, उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का प्रसिद्ध नारा दिया। उन्होंने देशवासियों से हफ्ते में एक दिन व्रत रखने की अपील की थी। देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने हरित क्रान्ति की नींव रखी। उनके नेतृत्व में भारत ने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। युद्ध के बाद शान्ति समझौते के लिए वह उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद गये। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के साथ ताशकंद-समझौते पर हस्ताक्षर करने के ठीक बाद, 11 जनवरी 1966 की रात रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनकी असाधारण सादगी, अदम्य साहस और देश के प्रति निःस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें मरणोपरांत वर्ष 1966 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्नसे सम्मानित किया गया।

कांग्रेस के प्रति समर्पण

अपने मंत्रालय के कामकाज के दौरान भी लाल बहादुर शास्त्री अपनी पार्टी कांग्रेस से सम्बंधित मामलों को देखते रहे एवं उसमें अपना भरपूर योगदान दिया। 1952-1957 एवं 1962 के आम चुनावों में पार्टी की निर्णायक एवं जबर्दस्त सफलता में उनकी सांगठनिक प्रतिभा एवं चीजों को नजदीक से परखने की उनकी अद्भुत क्षमता का बड़ा योगदान था।

लोकप्रियता

तीस से अधिक वर्षों तक समर्पित सेवा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री अपनी उदात्त निष्ठा एवं क्षमता के लिए लोगों के बीच प्रसिद्ध हो गये। विनम्र, दृढ, सहिष्णु एवं जबर्दस्त आंतरिक शक्तिवाले शास्त्री जी लोगों के बीच ऐसे व्यक्ति बनकर उभरे जिन्होंने लोगों की भावनाओं को समझा। वह अपनी दूरदर्शिता से देश को प्रगति के मार्ग पर लेकर आये। महात्मा गांधी द्वारा दी गयी राजनीतिक शिक्षाओं से वह अत्यंत प्रभावित थे। उनका मानना था “मेहनत प्रार्थना करने के समान है।“ महात्मा गांधी के समान विचार रखनेवाले लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान हैं।