आज के राजनेताओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं पंडित जवाहर लाल नेहरू

लोकतंत्र के पैरोकार थे पंडित नेहरू, सही माने में इसे जीया भी

आज के राजनेताओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं पंडित जवाहर लाल नेहरू

नयी पीढ़ी को जानना जरूरी है कि हमारा देश भारत आज जिस विकास की गाथा लिये दिख रहा है वह हमेशा नहीं रहा है। कभी सोने की चिड़िया का देश कहे जानेवाले भारत को अंग्रेजी हुकूमत से जब मुक्ति मिली, उस समय तक हमारे देश को काफी नुकसान हो चुका था। हर स्तर पर काफी कमजोर हो चुका था। पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में जब पहली सरकार का गठन हुआ तो उनके समक्ष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिले देश को खड़ा करने में अनेक चुनौतियाँ थीं। लेकिन, पंडित जवाहर लाल नेहरू, उनके बाद के प्रधानमंत्रियों, खासकर लाल बहादुर शास्त्री, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकारों ने काफी मेहनत कर देश को सशक्त बनाया। नयी पीढ़ी को अपने प्रधानमंत्रियों को जानने के लिए उनके बारे में संक्षेप में महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध कराने की हम यथासंभव कोशिश करेंगे। इसकी शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से कर रहे हैं।

पंडित जवाहर लाल नेहरू लोकतंत्र के केवल पैरोकार थे, बल्कि सही माने में इसे जीया भी। प्रधानमंत्री रहते उनके साथ कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं जो आज के राजनेताओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। एक घटना है संसद परिसर की, जबकि दूसरी दिल्ली से दूर ग्रामीण इलाके की। इतिहास में दर्ज एक चर्चित वाकये के अनुसार, समाजवादी नेता डा राम मनोहर लोहिया के कहने पर एक साधारण महिला ने संसद परिसर में पंडित जवाहरलाल नेहरू को रोककर खरी-खोटी सुनायी थी। उस महिला ने पंडित नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया और पूछा कि देश के आजाद होने और उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद उसे (एक आम नागरिक को) क्या मिला है? इस पर पंडित नेहरू ने तल्ख होने के बजाय शांति से मुस्कुराते हुए जवाब दिया: उन्हें यह मिला है कि आज वो देश के प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़कर सवाल पूछने की हिम्मत रखती है।

दूसरी घटना है हिमाचल से सटे एक ग्रामीण इलाके की। नेहरू के काफिले में शामिल एक गाड़ी की चपेट में आने से एक बकरी की मौत से गुस्सायी बुजुर्ग महिला ने पंडित नेहरू के काफिले रुकवा दिया। पंडित नेहरू ने कारण जानना चाहा तो उक्त महिला ने उनका हाथ पकड़ लिया और गुस्से में बोली कि आजादी तो तुम्हें मिली है जिसने मेरी बकरी को कुचल दिया और काफिला लेकर आगे बढ़ गये। मैं तो आज भी वही हूँ। इसपर पंडित नेहरू ने यह कह उसका गुस्सा शांत किया कि वो देश के प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ शिकायत कर रही है, जो अंग्रेजी हुकूमत में संभव नहीं था। बाद में उन्होंने बकरी की कीमत से दोगुना धनराशि दे वहाँ से काफिला बढ़ाया। इस तरह की और भी कई घटनाएँ हैं जिनका जिक्र किया जाये तो लघु पुस्तक का रूप ले ले। ये घटनाएँ स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी को दर्शाता है। पंडित नेहरू की चाहे जितनी आलोचना की जाये, हकीकत यही है कि उन जैसी शख्सियत को शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता।

प्रारंभिक जीवन:

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री, स्वतंत्रता सेनानी एवं आधुनिक भारत का वास्तुकार माने जानेवाले पंडित जवाहरलाल नेहरू ईस्वी सन् 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री रहे। उनका जन्म 14 नवम्बर 1889 ईस्वी को उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है, में एक सम्पन्न कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू प्रसिद्ध बैरिस्टर (वकील) थे और माता स्वरूप रानी गृहिणी थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके अपने घर पर निजी शिक्षकों से हुई। सोलह साल की उम्र में वह इंग्लैंड चले गये और वहाँहैरोज स्कूल में दो वर्ष अध्ययन करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय केट्रिनिटी कॉलेज से प्राकृतिक विज्ञान में स्नातक की और फिरइनर टेम्पल में दो वर्ष कानून की शिक्षा प्राप्त की थी। सन 1912 ईस्वी में भारत लौटने पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वकील के रूप में अपना जीवन शुरू करने का प्रयास किया। हालाँकि, अपने पिता के विपरीत, उनकी अपने पेशे में रुचि नाममात्र की ही थी और उन्हें तो वकालत करना पसंद था और ही वकीलों की संगति।

सक्रिय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश:

इंग्लैंड से भारत लौटने के लगभग तीन वर्ष बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में सहभागिता निभानी शुरू की। 1912 में उन्होंने एक प्रतिनिधि के रूप में बिहार के पटना में आयोजित बाँकीपुर सम्मेलन में भाग लिया। 1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। छात्र जीवन के दौरान भी वह विदेशी हुकूमत के अधीन देशों के स्वतंत्रता संघर्ष में रुचि रखते थे। उन्होंने आयरलैंड में हुए सिनफेन आन्दोलन में गहरी रुचि ली थी। सन् 1916 ईस्वी में महात्मा गांधी के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह सहित स्वतंत्रता संग्राम के कई आन्दोलनों में भाग लिया। 1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। इस क्रम में वह नौ बार जेल गये थे और उन्होंने अपने जीवन के 3259 दिन अर्थात लगभग 9 साल जेल में बिताये थे। उन्होंने 1920 में उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पहला किसान मार्च का आयोजन किया। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के सिलसिले में उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा था। पहली बार उन्होंने 1921 में गिरफ्तारी दी थी। उनकी सबसे लम्बी और आखिरी जेल की सजा 9 अगस्त 1942 कोभारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान शुरू हुई थी। मार्च 1945 में रिहा किया गया था।

सितम्बर 1923 में पंडित जवाहर लाल नेहरू अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के महासचिव बने। उन्होंने 1926 में इटली, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी एवं रूस का दौरा किया। बेल्जियम में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने 1927 में मास्को में समाजवादी क्रान्ति की दसवीं वर्षगाँठ समारोह में भाग लिया। इससे पहले 1926 में, मद्रास कांग्रेस में कांग्रेस को आजादी के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध करने में नेहरू की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1928 में लखनऊ में वह साइमन कमीशन के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे, उनपर लाठी चार्ज किया गया था। 29 अगस्त 1928 को उन्होंने सर्वदलीय सम्मेलन में भाग लिया। वह उनलोगों में से एक थे जिन्होंने भारतीय संवैधानिक सुधार की नेहरू रिपोर्ट पर अपने हस्ताक्षर किये थे। इस रिपोर्ट का नाम उनके पिता मोतीलाल नेहरू के नाम पर रखा गया था। उसी वर्ष उन्होंनेभारतीय स्वतंत्रता लीग की स्थापना की एवं इसके महासचिव बने। इस लीग का मूल उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्णतः अलग करना था।

1929 में पंडित नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सम्मेलन के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गये जिसका मुख्य लक्ष्य देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था। सन् 1929 के लाहौर अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप मेंपूर्ण स्वराज का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया था। उन्हें 1930-35 के दौरान नमक सत्याग्रह एवं कांग्रेस के अन्य आन्दोलनों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने 14 फ़रवरी 1935 को अल्मोड़ा जेल में अपनीआत्मकथा का लेखन कार्य पूर्ण किया। नेहरू जी ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘ऑटो बायोग्राफी सहित कई प्रमुख पुस्तकें अल्मोड़ा, देहरादून और नैनी जैसी विभिन्न जेलों में कैद रहने के दौरान ही लिखी थीं। रिहाई के बाद वह अपनी बीमार पत्नी को देखने स्विट्जरलैंड गये एवं उन्होंने फरवरी-मार्च, 1936 में लंदन का दौरा किया। उन्होंने जुलाई 1938 में स्पेन का उस समय दौरा किया, जब वहां गृह युद्ध चल रहा था। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले वह चीन के दौरे पर भी गये। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत को युद्ध में भाग लेने के लिए मजबूर करने का विरोध करते हुए व्यक्तिगत सत्याग्रह किया, जिसके कारण 31 अक्टूबर 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दिसम्बर 1941 में अन्य नेताओं के साथ जेल से मुक्त कर दिया गया। 7 अगस्त 1942 को मुम्बई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में उन्होंने ऐतिहासिक संकल्पभारत छोड़ो को कार्यान्वित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 8 अगस्त 1942 को उन्हें अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर अहमदनगर किला ले जाया गया। यह अंतिम मौका था जब उन्हें जेल जाना पड़ा एवं इसी बार उन्हें सबसे लम्बे समय तक जेल में समय बिताना पड़ा। जनवरी 1945 में अपनी रिहाई के बाद उन्होंने राजद्रोह का आरोप झेल रहे आइएनए (INA) के अधिकारियों एवं व्यक्तियों का कानूनी बचाव किया। मार्च 1946 में पंडित नेहरू ने दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा किया। 6 जुलाई 1946 को वह चैथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। 1951 से 1954 तक तीन और बार वह इस पद के लिए चुने गये।

भारत को पंडित नेहरू की देन:

देश को पंडित जवाहरलाल नेहरू की सबसे बड़ी देन आधुनिक भारत की मजबूत नींव है। उन्होंने शून्य से शुरुआत कर विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों, भारी उद्योगों, और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्थापना की। उनकी दूरदर्शिता ने ही एक कृषि प्रधान और संसाधनों की कमीवाले देश को एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली राष्ट्र बनाया। आधुनिकीकरण के प्रबल समर्थक होने के कारण पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), भारतीय प्रबंध संस्थान (आइआइएम) की स्थापना की। आम नागरिकों को विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएँ देने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे प्रतिष्ठित अस्पतालों की शुरुआत की। इसरो और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों की स्थापना को बढ़ावा दिया। परमाणु ऊर्जा आयोग, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की नींव रखी गयी। अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने शीत युद्ध के दौरान भारत को किसी भी गुट में शामिल होने से बचाया और गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना की। पड़ोसी देशों से शांतिपूर्ण सम्बंधों के लिएपंचशील का सिद्धांत दिया। देश की आर्थिक प्रगति और औद्योगीकरण के लिए उन्होंने योजना आयोग के माध्यम से पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की। उनके प्रयासों से ही भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे विशाल इस्पात कारखानों की स्थापना हुई। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उन्होंने भारत को एक मजबूत, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक पहचान दी।

विशेष पहचान:

कांग्रेस के सभी नेताओं में से, पंडित नेहरू ही एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने विश्व समुदाय में भारत के स्थान पर गंभीरता से विचार किया था। इसी कारण वह केवल स्वतंत्रता से पहले भारतीय जनता को विदेश मामलों की शिक्षा दे सके, बल्कि स्वतंत्रता मिलने पर भारतीय विदेश नीति पर अपने विचार भी रख सके। जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, तो विश्व के सामने उसकी छवि वास्तव में नेहरू की ही थी। भारतीय राष्ट्रवाद के प्रारंभिक वर्षों में, विश्व ने भारत को नेहरू से जोड़ा।

अपनी राजनीतिक सूझबूझ और नीतिगत उपलब्धियों के साथ-साथ, भारत में नेहरू को एक स्नेही नेता के रूप में भी सम्मान प्राप्त था। वह बच्चों के बहुत प्रिय थे। उन्हें भी बच्चों से बेहद लगाव था। यह लगाव स्मृति के तौर पर रहे, इसके लिए उनके जन्मदिवस कोबाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका जन्मदिन, 14 नवम्बर, एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह उत्सव बाल दिवस के रूप में 1950 के दशक से मनाया जाता है। यह अनौपचारिक अवकाश बच्चों के अधिकारों और उनकी क्षमताओं को मान्यता देता है, बाल कल्याण और शिक्षा को बढ़ावा देता है और शैक्षिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ बचपन का जश्न मनाता है। 1953 में पंडित नेहरू ने एक पत्र में उल्लेख किया कि दिल्ली में उनके जन्मदिन पर बाल दिवस धूमधाम से मनाया गया था, जिसमें बच्चों की परेड भी शामिल थी।

समाजवादी सोच:

प्रधानमंत्री के रूप में अपने 17 वर्षों के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवाद को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया एवं इस बात पर जोर दिया कि भारत को लोकतंत्र और समाजवाद दोनों को प्राप्त करना आवश्यक है। अपने कार्यकाल के दौरान संसद में कांग्रेस पार्टी के भारी बहुमत की बदौलत वो इस लक्ष्य की ओर अग्रसर हुए। उनकी घरेलू नीतियों के चार स्तम्भ थे लोकतंत्र, समाजवाद, एकता और धर्मनिरपेक्षता। अपने जीवनकाल में वह इन चारों स्तम्भों पर टिकी संरचना को काफी हद तक बनाये रखने में सफल रहे।

देश को मजबूती प्रदान करने की सोच:

भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में नेहरू का महत्व इस बात में निहित है कि उन्होंने आधुनिक मूल्यों और विचार-पद्धतियों को आयात किया और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर उन्हें भारत में फैलाया। धर्मनिरपेक्षता और भारत की जातीय और धार्मिक विविधताओं के बावजूद उसकी मूलभूत एकता पर जोर देने के अलावा, नेहरू भारत को वैज्ञानिक खोज और तकनीकी विकास के आधुनिक युग में आगे ले जाने के लिए भी अत्यंत चिंतित थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपनी जनता में गरीबों और समाज से बहिष्कृत लोगों के प्रति सामाजिक सरोकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान की आवश्यकता के प्रति जागरूकता पैदा की। उनकी विशेष रूप से गौरवान्वित उपलब्धियों में से एक प्राचीन हिन्दू नागरिक संहिता में सुधार था, जिसने अंततः हिन्दुओं को सशक्त बनाया। विधवाओं को उत्तराधिकार और सम्पत्ति के मामलों में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होंगे।

उत्कृष्ट लेखक:

पंडित जवाहर लाल नेहरू एक उत्कृष्ट लेखक भी थे। जेल में बिताये समय के दौरान उन्होंने कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत एक खोज), ऑटोबायोग्राफी (आत्मकथा), ग्लिम्पसेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्री (विश्व इतिहास की झलक) आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें थी। देश और दुनिया में शान्ति, लोकतंत्र और समाजवाद के अग्रदूत रहे पंडित नेहरू ने 27 मई 1964 को इस लोक से हमेशा के लिए विदा ले ली।