नयी दिल्ली। राजीव गांधी देश के सबसे कम उम्र में प्रधानमंत्री बननेवाले ऐसे शख्स थे जिन्होंने भारत में कंम्प्यूटर क्रान्ति एवं संचार क्रान्ति की नींव रखी। राजनीतिक परिवार में जन्म और लालन-पालन के बावजूद पेशे से पायलट राजीव गांधी राजनीति से मीलों दूर थे। अपनी माँ आयरन लेडी के तौर पर मशहूर भारत—रत्न इन्दिरा गांधी की शहादत के बाद उन्होंने काफी दबाव पर राजनीति में कदम रखी और देश के सबसे कम उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेनेवाले पहले शख्स बने।
महाराष्ट्र के बॉम्बे में 20 अगस्त 1944 को जन्म लेनेवाले राजीव गांधी महज तीन वर्ष के थे जब भारत स्वतंत्र हुआ और उनके नाना स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद माता-पिता (इन्दिरा गांधी—फिरोज गांधी) लखनऊ से नयी दिल्ली आकर बस गए। उनके पिता फिरोज गांधी राय बरेली से सांसद थे और उनकी पहचान एक निडर तथा मेहनती सांसद के रूप में थी।
राजीव गांधी का बचपन नाना पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ तीन मूर्ति भवन में बीता, जहाँ इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की परिचारिका के रूप में कार्य किया। प्रारंभिक शिक्षा के लिए राजीव गांधी को कुछ समय के लिए देहरादून के वेल्हम स्कूल में नामांकन कराया गया, लेकिन जल्द ही उन्हें हिमालय की तलहटी में स्थित आवासीय दून स्कूल में भेज दिया गया। वहां उनके कई मित्र बने जिनके साथ उनकी आजीवन दोस्ती बनी रही। बाद में उनके छोटे भाई संजय गांधी को भी इसी स्कूल में भेजा गया जहाँ दोनों साथ रहे। स्कूल से निकलने के बाद राजीव गांधी कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गये, लेकिन जल्द ही वो वहां से हटकर लन्दन के इम्पीरियल कॉलेज चले गये। उन्होंने वहां से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
सोनिया गांधी से मुलाकात
राजीव गांधी जब कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में थे, उनकी मुलाकात इतालवी सोनिया माइनो से हुई थी। सोनिया माइनो उस समय वहां अंग्रेजी की पढ़ाई कर रही थीं। वर्ष 1968 में नयी दिल्ली में सोनिया माइनो ने राजीव गांधी से शादी कर ली और फिर सोनिया माइनो से वह सोनिया गांधी बन गईं। वे अपने दोनों बच्चों, राहुल और प्रियंका के साथ नयी दिल्ली में इंदिरा गांधी के निवास पर रहे।
राजनीति में प्रवेश
राजनीतिक गतिविधियों के बीच रहकर भी उन्होंने (राजीव गांधी) राजनीति से दूरी बनाकर रखा। परन्तु, 1980 में एक विमान दुर्घटना में उनके भाई संजय गांधी की मौत ने सारी परिस्थितियाँ बदल कर रख दीं। उनपर राजनीति में प्रवेश करने एवं अपनी माँ को राजनीतिक कार्यों में सहयोग करने का दवाब बन गया। कई आंतरिक एवं बाह्य चुनौतियाँ भी सामने आयीं। पहले उन्होंने इन दबावों का विरोध किया, लेकिन बाद में वे उनके द्वारा दिये तर्क से सहमत हो गए। अपनी माँ इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद 1984 में उन्होंने सत्ता संभाली। राजनीति में आने से पहले वो कमर्शियल पायलट थे और ‘इंडियन एयरलाइंस’ में विमान उड़ाते थे।
राजीव गांधी का पूरा परिवार स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय राजनीति के केन्द्र में था। पिता फिरोज गांधी स्वतंत्रता सेनानी और रायबरेली पूर्व से दो बार सांसद रहे। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में उनकी गिनती होती थी। उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू और माता इंदिरा गांधी भी स्वतंत्रता सेनानी और प्रधानमंत्री के रूप में आज भी याद किये जाते हैं। राजीव गांधी का भी देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

डिजिटल और सूचना क्रांति का जनक
राजीव गांधी को भारत में कंम्प्यूटर और दूरसंचार क्रांति का जनक माना जाता है। आधुनिक सोच वाले राजीव गांधी ने भारत में कंम्प्यूटर क्रांति, संचार क्रांति की नींव रखी और 21वीं सदी के सशक्त भारत का निर्माण किया। उन्होंने सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमेटिक्स (STD) की स्थापना की, जिससे देश के कोने-कोने में टेलीफोन और एसटीडी की सुविधा पहुँची। वर्ष 1989 में संविधान संशोधन (61वां संशोधन) के माध्यम से मतदान की उम्रसीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी, जिससे देश के युवाओं को सीधे राजनीति और लोकतंत्र में भागीदारी का अवसर मिला। पंचायतीराज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिलाने का श्रेय राजीव गांधी को ही जाता है। इसके लिए उन्होंने संविधान में 73वाँ और 74वाँ संशोधन करवाया। इससे लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूती मिली। महिलाओं को स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण की भी व्यवस्था इन्हीं के कार्यकाल में की गयी।
शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम
राजीव गांधी की सोच थी कि देश को आगे बढ़ाने के लिए यहाँ के लोगों का शिक्षित होना जरूरी है। चूँकि ग्रामीण इलाकों में शिक्षा को लेकर काफी पिछड़ापन देखा जा रहा था, इसलिए उन्होंने ग्रामीण प्रतिभाओं को उभारने का निर्णय लिया। उसी सोच को ध्यान में रख वर्ष 1986 में नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की और जवाहर नवोदय विद्यालयों की नींव रखी। इस व्यवस्था ने शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया। ग्रामीण स्तर से कई प्रतिभाएँ निकलीं और देश-दुनिया में अपना मुकाम हासिल किया। विज्ञान एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिया।
शांति समझौते और विदेश नीति
उन्होंने देश की अखंडता बनाये रखने के लिए पंजाब और असम समझौते जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम उठाये। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने भारत को शांतिदूत के रूप में स्थापित करने का काम किया। उनकी विदेश नीति का कायल अमेरिका जैसा देश भी था। इसका एक उदाहरण वह वाकया है जब अमेरिका के समकालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन 12 जून 1985 को ह्वाइट हाउस में बारिश के दौरान खुद छाता थामकर राजीव गांधी को उनकी कार तक छोड़ने आये थे। इसी तरह श्रीलंका में जातीय संघर्ष और लिट्टे के विद्रोह को समाप्त करने के लिए वहाँ के तत्कालीन राष्ट्रपति जूनियस रिचर्ड जयवर्धने ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से सहयोग की अपील की थी। तब 29 जुलाई 1987 को कोलम्बो में दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। उक्त समझौते के तहत श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में भारतीय शांति सेना को तैनात किया गया था।

खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य
नवम्बर 1982 में भारत ने एशियाई खेलों की मेजबानी की थी। उस समय राजीव गांधी ने स्टेडियम के निर्माण एवं अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने सम्बंधी वर्षों पहले किये वादे को पूरा किया गया था। राजीव गांधी को जिम्मेदारी दी गई थी कि सारे काम समय पर पूर्ण हों एवं यह सुनिश्चित किया जा सके कि बिना किसी रुकावट एवं खामियों के खेल का आयोजन किया जा सके। उन्होंने दक्षता एवं निर्बाध समन्वय का प्रदर्शन करते हुए इस चुनौतीपूर्ण कार्य को सम्पन्न किया। साथ ही, कांग्रेस महासचिव के रूप में उन्होंने उसी तन्मयता से काम करते हुए पार्टी संगठन को व्यवस्थित एवं सक्रिय किया। उनके सामने आगे इससे भी अधिक मुश्किल परिस्थितियां आनेवाली थीं, जिसमें उनके व्यक्तित्व का परीक्षण होना था।
31 अक्टूबर 1984 को अपनी माँ की क्रूर हत्या के बाद वो कांग्रेस अध्यक्ष एवं देश के प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन व्यक्तिगत रूप से इतने दुःखी होने के बावजूद उन्होंने संतुलन, मर्यादा एवं संयम के साथ राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अच्छे से निर्वहन किया। महीने भर के लम्बे चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने पृथ्वी की परिधि के डेढ़ गुना के बराबर दूरी की यात्रा करते हुए देश के लगभग सभी भागों में जाकर 250 से अधिक सभाएँ कीं एवं लाखों लोगों से आमने-सामने मिले।
राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन की दोस्ती
राजीव गांधी और अभिनेता अमिताभ बच्चन की दोस्ती राजनीतिक और फिल्मी गलियारों में एक मिसाल मानी जाती थी। दोनों परिवारों की दोस्ती पंडित जवाहरलाल नेहरू और हरिवंश राय बच्चन के समय से चली आ रही थी। इंदिरा गांधी और तेजी बच्चन भी बहुत पक्की सहेलियां थीं। अमिताभ और राजीव की पहली मुलाकात तब हुई थी, जब अमिताभ करीब चार साल के और राजीव दो साल के थे। जब राजीव पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गये थे तब वो अमिताभ को चिट्ठियाँ लिखा करते थे। वहाँ से उन्होंने अमिताभ बच्चन के लिए जींस लेकर आये थे, जिसे अमिताभ ने सालों तक पहना। राजीव और अमिताभ 'दो दिल एक जान' की तरह थे। सोनिया गांधी जब भारत आयीं तो शादी से पहले वो बच्चन परिवार के घर पर ही रुकी थीं। राजीव गांधी के कहने पर ही 1984 में अमिताभ बच्चन ने राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। बोफोर्स सौदा विवाद में बेवजह नाम आने के कारण अमिताभ बच्चन ने राजनीति से संन्यास ले लिया। बावजूद इसके दोनों के बीच का व्यक्तिगत सम्बंध आजीवन कायम रहा।
आधुनिक सोच एवं निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता
स्वभाव से गंभीर, लेकिन आधुनिक सोच एवं निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता वाले राजीव गांधी देश को दुनिया की उच्च तकनीकों से पूर्ण करना चाहते थे और जैसा कि वे बार-बार कहते थे कि भारत की एकता को बनाये रखने के उद्देश्य के अलावा उनके अन्य प्रमुख उद्देश्यों में से एक है ‘इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण’। नयी सोच और नयी तकनीक के पैरोकार राजीव गांधी 27 मई 1991 की रात हमेशा के लिए धरती को छोड़ गये। तमिलनाडु के श्रीपेरम्बुदूर में चुनावी सभा के दौरान आत्मघाती हमला में उनकी हत्या कर दी गयी। इस तरह भारतवर्ष ने एक आधुनिक सोच एवं निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता रखनेवाले एक ऐसे दिव्यद्रष्टा को खो दिया जिसने देश को विश्व के मानचित्र पर विकासशील शक्तिशाली देशों की श्रेणी में खड़ा करने में अहम भूमिका निभायी।