पटना। बिहार सरकार ने राज्य में सूचना तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। कैबिनेट की बैठक में 'बिहार सोशल मीडिया एवं अन्य ऑनलाइन मीडिया (संशोधन) नियमावली, 2026' को मंजूरी दे दी गयी है। इस नीति के तहत यदि कोई सूचीबद्ध (Empanelled) कंटेंट क्रियेटर या रील निर्माता सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं पर वीडियो बनाता है, तो उसे व्यूज (Views) के आधार पर सीधे नगद प्रोत्साहन दिया जायेगा। नये नियमों के मुताबिक, प्रति 1 लाख व्यूज पर 10,000 रुपये की राशि दी जायेगी, जबकि 10 लाख या उससे अधिक व्यूज मिलने पर अधिकतम 1 लाख रुपये प्रति वीडियो का भुगतान किया जायेगा। यह कदम पारम्परिक विज्ञापन तरीकों से हटकर सीधे जनता, विशेषकर युवाओं से जुड़ने की एक अभिनव कोशिश है। हालांकि, नीतिगत गलियारों और आम जनता के बीच इस फैसले के दूरगामी प्रभावों को लेकर एक नयी बहस छिड़ गयी है।
समर्थक सरकार के इस कदम को सकारात्मक प्रभाव डालनेवाला बता रहे हैं। उनका मानना है कि रोजगार और जागरूकता का यह नया संगम साबित होगा। युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। बिहार जैसे राज्य में जहां बड़े उद्योगों की कमी है, वहां यह नीति युवाओं को 'कंटेंट क्रिएटर'(Content Creator) के रूप में स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित करेगी। गांवों और कस्बों के छोटे क्रिएटर्स भी अपनी क्षेत्रीय भाषा (Regional language) भोजपुरी, मगही, मैथिली आदि में रील बनाकर अच्छी कमाई कर सकेंगे। यही नहीं, इस योजना का सकारात्मक पहलू यह भी है कि सरकार की योजनाओं की जानकारी अंतिम पायदान तक पहुंचेगी।
दरअसल, अक्सर सरकारी नीतियां फाइलों या बड़े होर्डिंग्स तक सीमित रह जाती हैं। रील और शॉर्ट वीडियो के माध्यम से जटिल सरकारी योजनाएं (जैसे- छात्रवृत्ति, शिक्षा—ऋण, महिला उद्यमी योजना, कृषि सब्सिडी) बेहद सरल भाषा में सीधे लाभार्थियों के मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचेंगी। परिणाम यह होगा कि बिहार की सकारात्मक छवि का निर्माण होगा। राज्य के सुदूर पर्यटन स्थलों, कला-संस्कृति और विकास कार्यों पर बननेवाले वीडियो से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिहार की एक नयी और प्रगतिशील छवि उभरकर सामने आयेगी।
इस योजना का लाभ उठाने के लिए सरकार ने स्पष्ट नियम तय किये हैं। किसी भी क्रिएटर को सीधे भुगतान नहीं मिलेगा, बल्कि उन्हें पहले सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग (IPRD) के पास अपना पंजीकरण और एम्पैनलमेंट कराना होगा। वीडियो अपलोड होने के 30 दिनों के बाद ही व्यूज की आधिकारिक गणना की जायेगी। इसके साथ ही, अश्लील, भड़काऊ या साम्प्रदायिक कंटेंट बनानेवाले अकाउंट्स पर न केवल रोक होगी बल्कि उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है।
हालाँकि, इस योजना के अमल में आने पर सरकार के समक्ष कई चुनौतियाँ भी आ सकती हैं। गुणवत्ता और निष्पक्षता पर सवाल भी उठेंगे। अधिक व्यूज पाने की होड़ में क्रिएटर्स द्वारा सनसनीखेज या आधी-अधूरी जानकारी परोसने का जोखिम बढ़ जायेगा। यदि योजनाओं के नियमों को सही तरीके से नहीं समझाया गया, तो जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
आलोचकों का मानना है कि बिहार सरकार की इस नीति से सोशल मीडिया क्रिएटर केवल सरकार की प्रशंसा करने में जुट जायेंगे, जिससे जमीनी कमियों या कमियों को उजागर करनेवाली स्वतंत्र पत्रकारिता और रचनात्मक आलोचना की जगह खत्म हो सकती है।
फेक व्यूज (Fake views) और तकनीकी हेराफेरी (Technical manipulation) के बढ़ने की संभावना अधिक है। आज के समय में क्लिक-फार्म्स (Click-farms) और बॉट्स (Bots) के जरिये नकली व्यूज (Fake views) बढ़ाना बेहद आसान है। सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ से बचने के लिए व्यूज की प्रामाणिकता की जांच करना सरकार के लिए सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती होगी।
कहा जा सकता है कि बिहार सरकार की यह सोशल मीडिया नीति डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में एक बड़ा और साहसिक प्रयोग है। यदि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग पारदर्शिता, सटीक तकनीकी ऑडिट और गुणवत्ता नियंत्रण के साथ इसे लागू करता है, तो यह नीति न केवल राज्य के हजारों युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनायेगी, बल्कि जनता और सरकार के बीच की दूरी को भी पाट देगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार का यह 'डिजिटल मॉडल' आनेवाले समय में देश के अन्य राज्यों के लिए किस हद तक नजीर बनता है!