नयी दिल्ली। ZEN- G के बाद अब आरक्षण हटाओ आन्दोलन सरकार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। सोशल मीडिया से शुरू यह आन्दोलन दिल्ली के जंतर—मंतर के जरिये देशभर में फैलता जा रहा है। आन्दोलन में जुट रहे समर्थकों की भीड़ को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है और अजीत भारती सहित लगभग दो सौ आन्दोलनकारियों को हिरासत में लिया है। अजीत भारती पर एससी—एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की गयी है। पुलिस का कहना है कि अजीत भारती ने अपने एक वीडियो में एससी—एसटी को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया था।
जंतर—मंतर पर आन्दोलन शुरू होने से पहले बिहार के कई शहरों में सामान्य वर्ग के लोग सड़क पर उतर चुके थे और सरकार से आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में संशोधन की मांग उठा रहे थे। अब सार्वजनिक शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का आधार सामाजिक या जातिगत श्रेणियों के बजाय सिर्फ पारिवारिक आय के आधार पर आरक्षण की मांग के साथ देशभर से युवा जंतर-मंतर पर जुट रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि आरक्षण का लाभ एक परिवार में केवल एक ही बार या एक ही व्यक्ति को मिलना चाहिए। वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के जातिगत समानता नियमों को तुरंत वापस लेने की भी मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जरूरतमंदों को छात्रवृत्ति, फीस में छूट और मुफ्त कोचिंग जैसी मदद दी जाये, लेकिन नौकरियों में कोटा खत्म किया जाये।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान में शान्तिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी थी लेकिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया जा रहा है। जंतर—मंतर क्षेत्र में धारा 163 अर्थात BNSS लागू है। इस धारा के तहत 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने और रैलियों पर प्रतिबंध लगा होता है। सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए दिल्ली पुलिस के साथ रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और ITBP के भी जवानों को तैनात किया गया है।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर आन्दोलन का समर्थन किया है। उन्होंने लिखा है कि संविधान सभा में डॉ. बीआर अम्बेदकर ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण कोई अनंतकाल तक चलनेवाली सुविधा नहीं है। उन्होंने कहा था— ''10 साल में यह समीक्षा हो कि जिन्हें आक्षण दिया गया, क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार हुआ या नहीं?'' उन्होंने यह भी कहा था कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं देना चाहिए। इसके पीछे उन्होंने वजह बतायी थी कि आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं है, जिसके सहारे पूरी जिंदगी काट दी जाये। यह विकसित होने का एक मात्र अधिकार है। यही वजह है कि अम्बेदकर ने संविधान में आरक्षण की स्थाई व्यवस्था नहीं की थी।
अश्विनी दुबे के मुताबिक, आरक्षण के मुद्दे पर बनी कमिटी भी इस व्यवस्था के खिलाफ थी। यही वजह है कि कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर जब दिसम्बर 1949 में धारा 292 और 294 के तहत मतदान कराया गया तो उस वक्त सात में से पांच वोट आरक्षण के खिलाफ पड़े थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफ्ज-उर-रहमान, बेगम एजाज रसूल, तजम्मुल हुसैन और हुसैनभाई लालजी ने आरक्षण के विरोध में मतदान किया था। इन्होंने आरक्षण के दूरगामी परिणाओं का अंदाज उसी वक्त लगा लिया था।
हालांकि, उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बसपा सुप्रीमो मायावती सहित अनेक नेताओं ने आन्दोलन का विरोध किया है। मायावती ने एससी, एसटी और ओबीसी के लिए मिले जातिगत आरक्षण को खत्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण मांगने को देशहित के विरुद्ध बताया और कहा कि इससे समतामूलक समाज के निर्माण को आघात पहुंचता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईडब्ल्यूएस (EWS) के जरिये सवर्ण गरीबों के लिए पहले से ही आर्थिक आरक्षण की व्यवस्था है, लेकिन यदि उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है तो यह सरकारी व्यवस्था का दोष है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण सुधार के नाम पर इसे खत्म करने की मांग को पीडीए (PDA) समाज के खिलाफ एक गहरी साजिश करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि "आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा" और यह किसी की इच्छा का विषय नहीं बल्कि अधिकार है।'' लोजपा रामविलास के अध्यक्ष चिराग पासवान का कहना है कि आरक्षण किसी की खैरात नहीं बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है, जिसपर कोई चर्चा या इसे खत्म करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रदर्शनकारी अपनी मांगें विधिवत रखते हैं, तो सरकार बातचीत के लिए तैयार है। चिराग पासवान ने अपने बयानों में खड़गे का संदर्भ देते हुए समाज में आज भी कथित तौर पर व्याप्त जातिगत भेदभाव और छुआछूत की मानसिकता पर सवाल उठाया था। वहीं कांग्रेस पार्टी ने भी जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ उठी आवाजों और इस आंदोलन के पीछे छिपी मंशा को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।