नयी दिल्ली। 'वंदे मातरम' के छंदों और इसकी प्रस्तुति को लेकर एक नया विवाद छिड़ गया है। यह विवाद न सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक सीमित रह गयी है बल्कि बॉलीवुड की दो दिग्गज अभिनेत्रियाँ— शर्मिला टैगोर और कंगना राणावत के बाद अब कांग्रेस प्रवक्ता एवं सांसद सुप्रिया श्रीनेत भी आमने-सामने आ चुकी हैं।
'वंदे मातरम' को लेकर विवाद की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान 'वंदे मातरम' के गायन को लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण और राष्ट्रीय गीत के अनादर का आरोप लगाया। इस राजनीतिक घमासान के बीच एक साक्षात्कार में वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने अपनी राय साझा की। शर्मिला टैगोर ने तर्क दिया कि 'वंदे मातरम' के पूरे गीत को गाना उन लोगों के लिए कठिन हो सकता है जो एकेश्वरवाद यानी एक ही ईश्वर में विश्वास रखते हैं, क्योंकि बाद के छंदों में देवी दुर्गा और काली जैसे हिन्दु देवी-देवताओं के नामों का स्पष्ट संदर्भ आता है। समावेशिता और साम्प्रदायिक सौहार्द का हवाला देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि देश की धार्मिक विविधता को देखते हुए गीत के केवल पहले दो छंदों का ही गायन किया जाना सही है, जो राष्ट्र को एक माँ के रूप में प्रस्तुत करते हैं और सर्वमान्य हैं।
अपने जमाने की मशहूर अदाकारा रहीं शर्मिला टैगोर के इस बयान पर भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना राणावत ने तीखी आपत्ति जतायी। कंगना ने सोशल मीडिया पर एक लम्बा नोट साझा करते हुए कहा कि एक कलाकार के रूप में वह शर्मिला टैगोर की इस 'सीमित और बनावटी' व्याख्या से हैरान हैं। 'वंदे मातरम' जैसी कालजयी रचना को केवल धार्मिक आस्था या पूजा-पद्धति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। कविता और गीतों में शब्द अक्सर रूपक (Metaphors) और प्रतीक होते हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे 'शक्ति' शब्द का अर्थ राष्ट्र की ऊर्जा और साहस जगाने से है, वैसे ही राष्ट्रीय गीत के छंद स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक हैं। कंगना ने शर्मिला टैगोर से अपील की कि 'हिंदू-मुस्लिम वाली मानसिकता' से वो बाहर निकलें और कला को धर्म के आधार पर विभाजित न करें। हालांकि, कंगना ने बातचीत की गरिमा बनाये रखते हुए शर्मिला टैगोर के प्रति अपना व्यक्तिगत सम्मान भी प्रकट किया।
इस पूरे विवाद में राजनीतिक और वैचारिक मोर्चा संभालते हुए कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद सुप्रिया श्रीनेत ने भाजपा के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि 'वंदे मातरम' को लेकर कोई वास्तविक विवाद है ही नहीं, बल्कि भाजपा इसे जानबूझकर तूल दे रही है। उनका तर्क है कि कांग्रेस हमेशा इस विषय पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक सलाह और देश की स्थापित परम्परा का पालन करती आयी है, जिसके तहत राष्ट्रीय गीत के शुरुआती दो छंदों को ही आधिकारिक और समावेशी माना गया है।
सुप्रिया श्रीनेत और कंगना राणावत के बीच वैचारिक टकराव का लम्बा इतिहास रहा है। पूर्व में भी सोशल मीडिया पर कंगना की राजनीतिक यात्रा और उनकी धार्मिक पहचान को लेकर सुप्रिया श्रीनेत तीखे कटाक्ष कर चुकी हैं, जिससे दोनों नेताओं के बीच वाकयुद्ध लगातार चर्चा में रहता है। 'वंदे मातरम' को लेकर चल रही यह बहस भारत की वैचारिक विविधता को दर्शाती है। जहां एक ओर शर्मिला टैगोर और सुप्रिया श्रीनेत जैसे नाम बहुसांस्कृतिक भारत में विभिन्न धर्मों की संवेदनशीलता और ऐतिहासिक परम्पराओं के तहत पहले दो छंदों को गाने की वकालत करते हैं; वहीं दूसरी ओर कंगना राणावत और दक्षिणपंथी विचारक राष्ट्रीय गीत के पूर्ण स्वरूप को राष्ट्रीय गौरव, अदम्य शक्ति और कलात्मक रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि इसे मजहबी बंधनों से ऊपर रखा जाना चाहिए।