प्याज ने छलकाये आँसू, चीनी ने छीनी चाय की मिठास

आसमान छूती महंगाई से आम आदमी का जीना हुआ मुहाल

प्याज ने छलकाये आँसू, चीनी ने छीनी चाय की मिठास

Courtesy: AI

नयी दिल्ली। आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी को रुला दिया है। महिलाओं के लिए किचेन को व्यवस्थित रखना मुश्किल हो रहा है। चीनी की आसमान छूती कीमत ने सुबह की चाय से मिठास गायब करनी शुरु कर दी है, वहीं सब्जियों में प्याज डालने में किचेन को संभाल रही महिलाओं की आँखों से अनवरत आँसू गिरने लगे हैं। यह किसी क्षेत्र विशेष की हकीकत नहीं है, पूरे देश का यही हाल है। हालाँकि, केन्द्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से बढ़ती महंगाई की मार से राहत देने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। सरकार का कहना है कि देश में प्याज का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और आयात की कोई आवश्यकता नहीं है। 

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि लोगों को राहत देने के उद्देश्य से विशेष व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि जगह—जगह लोगों को बाजार से कम दाम पर 35 रुपये प्रतिकिलो की दर से प्याज उपलब्ध कराया जा रहा है। हालाँकि यह व्यवस्था एक संस्था की तरफ से की गयी है। उक्त संस्था द्वारा न केवल दिल्ली बल्कि देश के प्रमुख शहरों में 35 रुपये प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर आम जनता को प्याज मुहैया कराया जा रहा है। मांग को पूरा करने और आपूर्ति बढ़ाने के लिए 'कांदा एक्सप्रेस' ट्रेन के जरिये नासिक से दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि, मदुरै और गुवाहाटी जैसे बड़े शहरों में प्याज भेजा जा रहा है। हालाँकि, सरकार कह रही है कि देश में प्याज का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और आयात की कोई आवश्यकता नहीं है। 

देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में ही नहीं, पूरे देश में बढ़ती कीमतों का सबसे तीखा असर थोक और खुदरा, दोनों बाजारों पर पड़ा है। दिल्ली के थोक बाजारों में चीनी की कीमत दो महीने पहले की तुलना में करीब 32% बढ़कर 5 हजार 800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गयी है। वहीं खुदरा बाजारों में चीनी 65 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रही है। पिछले साल इस समय चीनी 45 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही थी। महंगाई की वजह से मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पैकेज्ड फूड, बेकरी और स्थानीय हलवाइयों की लागत बढ़ने से आम नाश्ते और मिठाइयों की कीमतें 15-20% महंगी हो गई हैं। 
उधर, बिहार में बाढ़, जल—जमाव और गन्ने की फसलों में बीमारियां लगने के कारण आपूर्ति की गंभीर किल्लत हो गई है। बिहार के स्थानीय खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतें पिछले हफ्ते के 48-50 रुपये से उछलकर 65 से 68 रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग वाले इस राज्य में बुनियादी राशन का महंगा होना कुपोषण और घरेलू तनाव को बढ़ा रहा है। हाल ही में राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार द्वारा कीमतों में वृद्धि पर दिये गए बयान कि "आजकल हर किसी को डायबिटीज है, इसलिए चीनी के दाम बढ़ने से फर्क नहीं पड़ेगा" ने इस संकट को लेकर आम जनता में और भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। 
उड़ीसा की बात की जाये तो अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में चीनी की सबसे उच्चतम कीमतों की मार उड़ीसा के उपभोक्ताओं पर पड़ी है। उड़ीसा में चीनी की खुदरा कीमत देश में सबसे अधिक 67.40 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो महज एक महीने पहले यह कीमत 50.78 रुपये थी और पिछले साल अगस्त 2025 में 46.89 रुपये प्रति किलोग्राम थी। एक साल के भीतर उड़ीसा में चीनी करीब 43.7% महंगी हो चुकी है। तटीय और आदिवासी बहुल इलाकों में आवश्यक वस्तुओं के आसमान छूते दामों के कारण दिहाड़ी मजदूरों को अपनी दैनिक कैलोरी और पोषण से समझौता करना पड़ रहा है।
 उड़ीसा से सटे पश्चिम बंगाल में आगामी दुर्गा पूजा एवं दीपावली जैसे त्योहारों के सीजन से ठीक पहले कीमतों में लगी इस आग ने बाजार का उत्साह फीका कर दिया है। पश्चिम बंगाल के बाजारों में चीनी की कीमतें 66.17 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई हैं, जो पिछले साल इसी अवधि में 47.50 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर थीं। बंगाल की संस्कृति में मिठाइयों का विशेष महत्व है। चीनी, तेल और मैदे के बढ़ते दामों के कारण कोलकाता और आसपास के जिलों के मोइरा (पारंपरिक मिठाई निर्माता) भारी वित्तीय दबाव में हैं। मिठाई से सम्बंधित एसोसिएशनों का कहना है कि लागत बढ़ने से त्यौहारों पर बिक्री में 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। 
मध्यप्रदेश में भी महंगाई के आंकड़े राष्ट्रीय औसत से ऊपर चल रहे हैं। मध्यप्रदेश के खुदरा बाजारों में चीनी की कीमत 65.38 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है, जो पिछले साल अगस्त में 44.98 रुपये थी। इसके अलावा खाद्य तेलों और दालों की कीमतों में भी औसतन 12-15 प्रतिशत की तेजी देखी जा रही है। नौकरीपेशा मध्यम वर्ग अपनी मासिक बचत को टूटते देख रहा है। घरों का संभाल रही महिलाओं का कहना है कि रसोई का जो खर्च पहले आठ हजार रुपये में संभल जाता था, वह अब 11 हजार रुपये को पार कर रहा है, जिससे बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अन्य जरूरी खर्च प्रभावित हो रहे हैं।
उत्तरप्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना और चीनी उत्पादक राज्य होने के बावजूद यहाँ भी आम जनता को कोई राहत नहीं मिल पा रही है। उत्तरप्रदेश की मिलों में एम-ग्रेड चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमतें 5,400 रुपये प्रति क्विंंटल को पार कर गई हैं। वहीं राज्य के खुदरा बाजारों में चीनी 58 से 64 रुपये प्रति किलो के बीच बिक रही है। गन्ना बेल्ट के नाम से अपनी पहचान बनाये पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसानों को जहां लागत (डीजल और उर्वरक) बढ़ने का नुकसान हो रहा है, वहीं पूर्वी और मध्य उत्तरप्रदेश के उपभोक्ता महंगे राशन से त्रस्त हैं। गन्ने की पैदावार में कमी और जमाखोरी के कारण मिलों से होनेवाली सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
इस बेतहाशा मूल्य वृद्धि के पीछे मुख्य रूप से खराब मौसम (कम मानसूनी बारिश), गन्ने की फसलों में बीमारियां, त्यौहारों की अग्रिम मांग और बड़े व्यापारियों द्वारा की जा रही जमाखोरी जिम्मेदार हैं। बढ़ते जन-आक्रोश को देखते हुए केन्द्र सरकार ने तत्काल प्रभाव से कई कदम उठाये हैं। चीनी डीलरों पर 1 अगस्त से 30 नवम्बर 2026 तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है ताकि कृत्रिम कमी न पैदा की जा सके। इसके अलावा घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्चे चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है। साथ ही थोक उपभोक्ताओं पर नकेल कसने की कोशिश की जा रही है। इसके तहत 1 सितम्बर 2026 से बड़े अथवा थोक उपभोक्ताओं (कोल्ड ड्रिंक्स और बड़ी बेकरी कंपनियां) को 15 दिनों से अधिक का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी।