Courtesy: A. I.
नयी दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है, बिना किसी बड़े सुपरस्टार, बिना करोड़ों के तड़क-भड़क वाले VFX और बिना किसी शोर-शराबे के कोई फिल्म सिनेमाघरों में 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकती है? मैं कहूंगी, हाँ, कर सकती है। फिल्म की स्टोरी यदि आम जनमानस की भावनाओं से जुड़ी हो, सुनने में कानों को अच्छा लगनेवाले संवाद हों और मधुर संगीत हो तो निश्चित तौर पर दर्शकों का आकर्षण ऐसी फिल्मों के प्रति बढ़ेगा।
ऐसी ही एक फिल्म आयी है 'हनुमान अंश'! हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' इस समय बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ा चमत्कार बनकर उभरी है! महज 10 लाख रुपये की ओपनिंग से शुरुआत करने वाली नीम करोली बाबा पर आधारित इस फिल्म ने 'मिर्जापुर: द मूवी' और 'टॉक्सिक' जैसी बड़ी फिल्मों को टक्कर दी है। फिल्म के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने इस फिल्म में ऐसा क्या दिया है, जिसने न सिर्फ बाबा के भक्तों का, बल्कि आम दर्शकों का भी दिल जीत लिया! क्या यह फिल्म वाकई देखने लायक है? आज के इस वीडियो में हम करेंगे 'हनुमान अंश' का एक बेहद ईमानदार और समीक्षात्मक विश्लेषण। वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा!"
सबसे पहले बात करते हैं फिल्म की कहानी की। 'हनुमान अंश' कहानी है लक्ष्मण दास शर्मा नाम के एक साधारण युवक की। एक ऐसा युवक, जिसके मन में जीवन, मृत्यु, इंसान के दुखों और इस संसार के बंधनों को लेकर अनगिनत सवाल हैं। अपने इन्हीं सवालों के जवाब और सत्य की तलाश में वह एक कठिन आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ता है। फिल्म बहुत ही खूबसूरती से दिखाती है कि कैसे यह साधारण युवक आगे चलकर पूरी दुनिया के चहेते संत, यानी 'नीम करोली बाबा' के रूप में तब्दील होता है। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह केवल उनके चमत्कारों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह उनके 'प्रेम और सेवा' के संदेश को बहुत ही गहराई से हमारे सामने रखती है।
अब बात करते हैं फिल्म की उन खूबियों की, जिन्होंने इसे मास्टरपीस बनाया है। इस फिल्म का पहला मजबूत पक्ष है सादगी और अभिनय। फिल्म में कोई भारी-भरकम सेट नहीं हैं। इसे बेहद प्राकृतिक और वास्तविक जगहों पर शूट किया गया है। अभिनेता शोभिनव सत्या ने बाबा नीम करोली के किरदार को इतनी सहजता और सादगी से जिया है कि आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी अभिनेता को देख रहे हैं।
दूसरा मजबूत पक्ष दिव्य चमत्कारिक दृश्य हैं। फिल्म में बाबा नीम करोली के जीवन के उन मशहूर प्रसंगों को दिखाया गया है, जिन्हें सुनकर हम बड़े हुए हैं। जैसे वो मशहूर 'ट्रेन वाला चमत्कार', जहाँ अंग्रेजों द्वारा बाबा को ट्रेन से उतारने के बाद ट्रेन टस से मस नहीं हुई थी। इसके अलावा, गांव में ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाने के लिए चावल बांटने का दृश्य दिल को छू जाता है।
इसके अलावा फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर, खासकर 'पार्वती' वाला गाना दर्शकों को भावुक कर देता है। जब थियेटर में फिल्म खत्म होती है, तो लोग स्क्रीन के सामने खड़े होकर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते हैं— ऐसा क्रेज सिनेमा में सालों बाद देखने को मिला है।" इससे पहले जय संतोषी माँ कम बजट में बनी फिल्म ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ते दिखी थी। 15 अगस्त 1975 को मशहूर एक्शन और ड्रामा फिल्म शोले के साथ रिलीज हुई भक्ति-प्रधान फिल्म 'जय संतोषी माँ' के निर्देशक विजय शर्मा थे और कहानी आर. प्रियदर्शी ने लिखी थी। संतोषी माँ, जिन्हें संतोषी माता भी कहा जाता है, संतोष की देवी हैं। फिल्म के भक्ति गीत उषा मंगेशकर और महेन्द्र कपूर ने गाये थे, और मशहूर कवि प्रदीप ने इन गीतों के बोल लिखे थे। कम बजट में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सबसे सफल फिल्मों में से एक साबित हुई थी।
एक निष्पक्ष समीक्षक के तौर पर हमें फिल्म के दूसरे पहलू पर भी बात करनी चाहिए। फिल्म का बजट बेहद सीमित, लगभग 1 करोड़ 75 लाख से 2 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। कम बजट होने के कारण, कुछ जगहों पर फिल्म का प्रोडक्शन और टेक्निकल फिनिशिंग उतनी ग्रैंड (Grand) नहीं लगती, जैसी आजकल की कॉमर्शियल फिल्मों में होती है। फर्स्ट हाफ में जब लक्ष्मी नारायण के विचारों और उनके वैराग्य को दिखाया जाता है, तो फिल्म की गति थोड़ी धीमी (Slow-paced) महसूस हो सकती है। कुछ दर्शकों को लग सकता है कि कहानी थोड़ी और क्रिस्प हो सकती थी। लेकिन यकीन मानिए, फिल्म का जो आध्यात्मिक तत्व (Spiritual Element) है, वो इन छोटी-मोटी कमियों को पूरी तरह से ढक लेता है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत क्या है, इसकी प्रामाणिकता यानी Authenticity! बाबा नीम करोली की जन्मस्थली उत्तरप्रदेश के अकबरपुर गांव से जब उनके परिवार के लोग जिला मुख्यालय फिरोजाबाद में यह फिल्म देखने पहुंचे, तो उन्होंने खुद माना कि पर्दे पर दिखायी गई हर बात वैसी ही है, जैसी उन्होंने अपने दादा-परदादाओं से सुनी थी। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाबा ने कभी खुद को भगवान नहीं कहा और न ही कभी चमत्कारों का दिखावा किया। वो बच्चों से भी वादा लेते थे कि उनके चमत्कारों को किसी को न बताएं। यही सादगी इस फिल्म की आत्मा है जो आज की नई पीढ़ी को बहुत मोटिवेट करती है।
फाइनल वर्डिक्ट की बात करें, तो 'हनुमान अंश' सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक दिव्य और रूहानी अनुभव है। अगर आप मारधाड़ और तड़क-भड़क वाली फिल्मों से थक चुके हैं और अपनी आत्मा को शांति देने वाला सिनेमा देखना चाहते हैं, तो अपने पूरे परिवार और बच्चों के साथ इस फिल्म को थियेटर में जरूर देखें।
क्या आपने यह फिल्म देख ली है? अगर हां, तो आपको बाबा का कौन सा चमत्कार या दृश्य सबसे अच्छा लगा, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। वीडियो पसंद आया हो तो लाइक करें, दोस्तों के साथ शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल न भूलें!