Courtesy: A. I.
नयी दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप ट्रेन से सफर करते हैं, तो आपकी ट्रेन किसी आउटर सिग्नल पर क्यों रुक जाती है? अक्सर जवाब मिलता है—'आगे मालगाड़ी पास हो रही है।' या फिर मालगाड़ियों को घंटों लूप लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन अब, भारत ने इस समस्या का एक ऐसा ऐतिहासिक समाधान ढूंढ निकाला है जिसने दुनिया को चौंका दिया है! जी हां, हम बात कर रहे हैं डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की। 2 हजार 843 किलोमीटर लम्बा यह विशाल मालगाड़ी नेटवर्क अब पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इसके आखिरी हिस्से के उद्घाटन के साथ ही भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है।
इस क्रांति को समझने के लिए पहले हमें बीमारी को समझना होगा। भारत में आजादी के बाद से यात्रियों और माल दोनों का बोझ एक ही पटरी पर था। हमारी पटरियों की क्षमता 100 प्रतिशत थी, लेकिन उनपर लोड 150 प्रतिशत से ज्यादा था। नतीजा? मालगाड़ियों की औसत रफ्तार घटकर महज 25 किमी प्रति घंटा रह गई थी। कोयला, अनाज और फैक्ट्रियों का सामान समय पर नहीं पहुंच पाता था, जिससे देश की लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का लगभग 14 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो विकसित देशों में मात्र 7 से 8 प्रतिशत है। इसी रुकावट को खत्म करने के लिए जन्म हुआ—'डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर' यानी सिर्फ और सिर्फ मालगाड़ियों के लिए बने विशेष ट्रैक का। इस पूरे नेटवर्क को दो मुख्य हिस्सों में बांटा गया है। पहला है पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, जिसकी लम्बाई एक हजार 337 किलोमीटर है। यह पंजाब के लुधियाना जिलांतर्गत साहनेवाल से शुरू होकर हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल के दानकुनी तक जाता है। यह रूट कोयला खदानों, स्टील प्लांटों और कृषि क्षेत्रों को जोड़ता है। दूसरा और सबसे चुनौतीपूर्ण है पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC), जिसकी लम्बाई एक हजार 506 किलोमीटर है। यह उत्तरप्रदेश के दादरी से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान, गुजरात से गुजरते हुए महाराष्ट्र के मुम्बई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक जाता है। यह कॉरिडोर भारत के सबसे बड़े बंदरगाहों को उत्तर भारत के औद्योगिक शहरों से सीधे जोड़ता है। अब सोचिए, दिल्ली से मुम्बई का जो माल पहुंचने में पहले 3 दिन लगते थे, वह अब मात्र 24 घंटे में पहुंच रहा है!
यह कॉरिडोर आम पटरियों से अलग है। पश्चिमी कॉरिडोर पर दुनिया की पहली ऐसी बिजली से चलने वाली मालगाड़ियाँ दौड़ रही हैं, जिन पर एक के ऊपर एक, दो कंटेनर लादे जाते हैं। आम पटरियों पर मालगाड़ी 25 की स्पीड से चलती थी, यहाँ ये 100 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ती हैं। इन पटरियों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये 25 से 32.5 टन का भारी एक्सल लोड उठा सकती हैं। यही नहीं, आम मालगाड़ी 700 मीटर लमबी होती है, लेकिन DFC पर 1.5 किलोमीटर लमबी 'लॉन्ग हॉल' ट्रेनें चलायी जा रही हैं। यानी एक ही बार में दोगुने से ज्यादा सामान की डिलीवरी!
इससे फायदा यह होगा कि हमें सस्ता सामान मिलेगा। जब सामान तेजी से और कम लागत में पहुँचेगा, तो कम्पनियों का खर्च घटेगा, जिससे बाजार में चीजें सस्ती होंगी। भारत का सामान विदेशों में भी कॉम्पिटिटिव बनेगा। इसके अलावा यात्री ट्रेनों की स्पीड बढ़ेगी। चूंकि मालगाड़ियाँ अब अपनी अलग पटरियों पर शिफ्ट हो चुकी हैं, इसलिए पुरानी पटरियाँ खाली हो गई हैं। अब आपकी वंदे भारत, राजधानी और एक्सप्रेस ट्रेनें बिना किसी रुकावट के समय पर चल सकेंगी। इससे पर्यावरण को भी राहत मिलेगा। ट्रकों पर निर्भरता कम होने और शत-प्रतिशत बिजली से चलने के कारण कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आयेगी।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सिर्फ पटरियों का जाल नहीं है, यह आत्मनिर्भर बनते भारत की नयी जीवन रेखा है। यह इस बात का सबूत है कि भारत अब बड़े प्रोजेक्ट्स सिर्फ सोचता नहीं है, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारकर पूरा भी करता है। भविष्य में सरकार ऐसे ही तीन और नये कॉरिडोर बनाने की योजना पर काम कर रही है।