नयी दिल्ली। तिब्बत-नेपाल सीमा पर ग्लेशियर के ढहने के कारण आयी अचानक भीषण बाढ़ ने नेपाल के कई पहाड़ी इलाकों में भारी तबाही मचाई है, जिसमें भारी जनहानि और सैकड़ों लोगों के लापता होने की पुष्टि की गई है। शुरुआती खबरों में भूकम्प को वजह माना गया था, लेकिन बाद में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने खुलासा किया कि यह तबाही हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने और भारी मलबा बहने से हुई है। सबसे अधिक प्रभाव नेपाल के रसुआ जिला, खासकर टिमुरे और स्याफ्रुबेसी बाजार के अलावा नुवाकोट और धादिंग जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
तबाही की मुख्य वजह भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में जलस्तर का अचानक 30 फीट तक बढ़ जाना बताया गया। नतीजा यह हुआ कि तेज गति के बहाव ने आस—पस के इलाकों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया। दर्जनों पुल, लगभग 40 किलोमीटर लम्बी सड़कें और कई जलविद्युत परियोजनाएं पानी के तेज बहाव में बह गईं। नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें भारत और अन्य देशों के कई पर्यटक एवं श्रद्धालु शामिल हैं। नेपाली सेना और प्रशासन द्वारा युद्धस्तर पर बचाव अभियान चलाया जा रहा है।
नेपाल में आयी विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने न केवल नेपाल बल्कि पूरे भारतवर्ष को झकझोर कर रख दिया है। यह जलप्रलय केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ इंसानी खिलवाड़, कमजोर बुनियादी ढांचे और जलवायु परिवर्तन के जानलेवा गठजोड़ का नतीजा है। हजारों लोग बेघर हो गये, हजारों जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं, अनगिनत की मौत हो चुकी है। अकेले भारत के विभिन्न राज्यों से नेपाल पहुँचे तीन सौ से अधिक लोग लापता बताये जा रहे हैं। यह सिर्फ अभी नहीं हुआ। हर साल इस तरह की घटनाएँ होती हैं और हजारों जान—माल के साथ ही करोड़ों का आर्थिक नुकसान होता है। बावजूद इसके न तो नेपाल सरकार और न ही चीन, तिब्बत और भारत की तरफ से कोई ठोस उपाय किये जा रहे हैं। मानसून की बारिश से चीन और तिब्बत में जमा होनेवाले पानी को बिना नेपाल को बताये छोड़ दिया जाता है और इसका दबाव जब नेपाल को नुकसान पहुँचाने लगता है तो वह जल का रूख भारत की ओर कर देता है।
तबाही का खौफनाक मंजर
मानसून की बारिश से आनेवाली इस तबाही की कहानी किसी खास साल की नहीं है। हर साल ऐसा होता है। यह अलग बात है कि इस वर्ष मानसून ने नेपाल में पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। बागमती, कोशी और नारायणी जैसी प्रमुख नदियाँ खतरे के निशान को पार कर गईं, जिससे काठमांडू घाटी सहित देश के अधिकांश हिस्से जलमग्न हो गए। इस जलप्रलय ने अबतक न केवल सैकड़ों मासूम जिंदगियाँ लील ली हैं और अरबों रुपये की राष्ट्रीय सम्पत्ति को तबाह कर दिया है। राजमार्ग मलबे में तब्दील हो चुके हैं, पुल बह गए हैं और कई गांव दुनिया से पूरी तरह कट चुके हैं। काठमांडू जैसे घने बसे शहर में नावों का चलना स्थिति की गंभीरता को बयां करता है। हर साल इस स्थिति से जूझनेवाला नेपाल संकट से बचने के लिए पानी का मुँह भारत की तरफ मोड़ देता है जिसका असर नेपाल से लगे भारत के कई शहरों पर पड़ता है। बिहार के कई जिलों में विनाशकारी बाढ़ आने से भीषण तबाही मचती है। हालाँकि नेपाल ने अभी पानी नहीं छोड़ा है, फिर भी प्रभावित इलाकों के लोग अभी से ही भयभीत दिख रहे हैं।
जलप्रलय का असली सच
सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा है? विशेषज्ञों का मानना है कि इस विनाश के पीछे तीन मुख्य कारण हैं— पहला, अनियोजित शहरीकरण, दूसरा पहाड़ों का बेतरतीब दोहन और तीसरा जलवायु परिवर्तन। काठमांडू और आसपास के इलाकों में बिना किसी ठोस जल निकासी योजना के कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिये गए। नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र पर अवैध निर्माण किये गए। जब पानी को बहने का रास्ता नहीं मिला, तो उसने बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया। विकास के नाम पर बिना वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पहाड़ों को काटने जैसी 'डोजर संस्कृति' ने हिमालयी क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बना दिया है। नतीजा यह है कि भारी बारिश होते ही अचानक भीषण भूस्खलन होने लगते हैं, जो नीचे बसे गांवों को जमींदोज कर रहे हैं। इसी तरह वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण मानसून का मिजाज बदल गया है। अब कम समय में अत्यधिक भारी बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं। नेपाल का नाजुक भूगोल इस तीव्र बदलाव को झेलने में सक्षम नहीं है।
सच्चाई का कड़वा पहलू
सच्चाई का एक कड़वा पहलू यह भी है कि नेपाल सरकार का आपदा प्रबंधन तंत्र हमेशा की तरह इस बार भी पूरी तरह से विफल साबित हुआ। मौसम विभाग की चेतावनियों के बावजूद, जोखिमवाले क्षेत्रों से लोगों को समय पर सुरक्षित स्थानों पर नहीं भेजा गया। राहत और बचाव कार्य पूरी तरह सेना और स्थानीय पुलिस के भरोसे रहा, जिनके पास आधुनिक संसाधनों की भारी कमी है। नदियों के किनारे बने बांधों और तटबंधों के रखरखाव में बरती गई लापरवाही ने इस त्रासदी को और अधिक घातक बना दिया।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
इस जलप्रलय ने नेपाल की रीढ़ मानी जानेवाली कृषि और पर्यटन उद्योग को गहरा जख्म दिया है। हजारों हेक्टेयर फसलें नष्ट हो चुकी हैं, जिससे आनेवाले समय में खाद्य संकट का खतरा मंडरा रहा है। साथ ही, बुनियादी ढाँचे के तबाह होने से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटने में कई साल लग सकते हैं। सबसे ज्यादा मार गरीब और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी है, जिनके घर और रोजगार दोनों छिन गए हैं।