ट्रम्प ने की सत्ता में आने पर हर नागरिक को पाँच हजार डॉलर देने की घोषणा

लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है मुफ्त घोषणाओं का प्रचलन

लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है मुफ्त घोषणाओं का प्रचलन

Courtesy: A. I.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मतदाताओं से कहा है कि यदि वे उन्हें पुन: चुनते हैं, यानी राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाते हैं तो उन्हें सरकार की तरफ से पाँच हजार डॉलर दिये जायेंगे। उन्होंने ये भी जोड़ा कि डॉलर को अमेरिका में ही खर्च करना होगा। ट्रम्प नहीं चाहते कि लोग इस पैसे को कनाडा, चीन या जर्मनी जैसे देशों में जाकर खर्च करें। इस योजना की तुलना उन्होंने एक सफल कम्पनी द्वारा अपने शेयरधारकों को दिये जाने वाले कैश लाभांश (Dividend) से की और इसे देश की आर्थिक सफलता का नतीजा बताया। आर्थिक विशेषज्ञों और एसोसिएटेड प्रेस (Associated Press AP) के अनुमान के मुताबिक, इस योजना पर एक ट्रिलियन यानी एक लाख करोड़ डॉलर से अधिक का खर्च आयेगा। अर्थशास्त्रियों ने इसको लेकर देश के बढ़ते बजटीय घाटे के बीच गंभीर चिंता और संदेह जताया है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प ने यह बड़ा दाँव गिरती हुई अप्रूवल रेटिंग्स और ईरान युद्ध एवं महंगाई को लेकर मतदाताओं की नाराजगी के बीच रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति मजबूत करने के लिए खेला है। यह ट्रंप द्वारा दिया गया एक बड़ा चुनावी वादा है, लेकिन इसे हकीकत में बदलने के लिए पहले रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में जीतना होगा और फिर संसद से कानून पारित कराना होगा।

चुनाव पूर्व लोक-लुभावन वादे और मुफ्त घोषणाएँ, जिन्हें भारत में 'रेवड़ी संस्कृति' और वैश्विक स्तर पर 'पॉपुलिज्म' कहा जाता है, वर्तमान समय में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने एक बड़ी वैचारिक और आर्थिक चुनौती बनकर उभरी हैं। वर्तमान समय में भारत के विभिन्न राज्यों के चुनावों से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों तक, मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए नगद हस्तांतरण, ऋण माफी और कर कटौती जैसे वादों की बाढ़ देखी गई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह प्रवृत्ति एक दोधारी तलवार की तरह है— जो सीमित अर्थों में लाभ के तौर पर सामाजिक सुरक्षा तो देती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से देश की अर्थव्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता को गंभीर नुकसान पहुँचाती है। 

वैश्विक स्तर पर वर्ष 2024 से 2026 के बीच का समय लोकतांत्रिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भारत के आम चुनाव और विधानसभा चुनावों से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों तक, एक प्रवृत्ति समान रूप से देखी गई है। भारत में इसे रेवड़ी संस्कृति कहा जाता है, तो पश्चिमी देशों और अमेरिका में इसे पॉपुलिज्म (Populism) या ऋण माफी और कर कटौती जैसी आर्थिक रणनीतियों के रूप में देखा जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह प्रवृत्ति कितनी सही है और यह लोकतंत्र के लिए खतरा है या लाभ, यह आज के समय का सबसे ज्वलंत प्रश्न है।

भारत में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा कई तरह के मुफ्त वादे किये जाते रहे हैं, जिनमें लाडली बहना योजना, किसान सम्मान निधि, बेरोजगारी भत्ता जैसे महिलाओं, किसानों और बेरोजगार युवाओं के लिए मासिक वित्तीय सहायता आदि शामिल हैं। इसके अलावा एक निश्चित यूनिट तक बिजली और घरेलू पानी की आपूर्ति मुफ्त,
स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप, साइकिल, या मिक्सर-ग्राइंडर का वितरण, कृषि ऋणों या बिजली के पुराने बिलों की पूरी तरह से माफी के जरिये मतदाताओं को लुभाने का प्रचलन देखा जा रहा है। जबकि, अमेरिका जैसी विकसित अर्थव्यवस्था में लोक-लुभावनवाद का रूप थोड़ा भिन्न होता है।

अमेरिका में चुनावों से ठीक पहले युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अरबों डॉलर के छात्र ऋणों को माफ करने की घोषणाएँ, मध्यम वर्ग या कॉर्पोरेट क्षेत्र को लुभाने के लिए भारी कर कटौती के वादे, हरित ऊर्जा या स्थानीय विनिर्माण जैसे विशिष्ट उद्योगों को भारी वित्तीय सहायता देकर रोजगार सृजन का वादा किया जाता है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे या उसके करीब रहता है, मुफ्त खाद्यान्न प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, आयुष्मान भारत जैसे मुफ्त चिकित्सा योजना, या नकद सहायता उनके अस्तित्व के लिए जरूरी है। यह न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करता है। शिक्षा के लिए मुफ्त लैपटॉप, साइकिल, विशेषकर छात्राओं के लिए, या मुफ्त वाई-फाई जैसी योजनाएँ सीधे तौर पर साक्षरता और डिजिटल समावेशन को बढ़ावा देती हैं। इसे मुफ्तखोरी के बजाय सामाजिक परिसम्पत्ति निर्माण माना जाना चाहिए। निचले तबके के हाथों में नगद पैसा या मुफ्त सेवाओं के माध्यम से होने वाली बचत, बाजार में उपभोग अर्थात Consumption को बढ़ाती है। 

जब गरीब व्यक्ति पैसा खर्च करता है, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था में मांग पैदा होती है, जो आर्थिक चक्र को गति देती है। इससे अंतिम पादान पर खड़े लोगों को मदद मिलती है। महिलाओं को सीधे बैंक खातों में मिलनेवाली राशि से उनका घरेलू निर्णयों में सम्मान और वित्तीय स्वायत्तता बढ़ती है। हालाँकि इसके अल्पकालिक लाभ भले ही आकर्षक दिखते हैं, लेकिन दीर्घकालिक रूप से इसके गंभीर आर्थिक और लोकतांत्रिक दुष्प्रभाव होते हैं। मुफ्त योजनाओं के कारण राज्यों और देशों का राजकोषीय घाटा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। पंजाब, केरल, राजस्थान सहित भारत के कई राज्य अपनी कुल राजस्व प्राप्ति का एक बड़ा हिस्सा केवल ऋण के ब्याज और मुफ्त योजनाओं को लागू करने में खर्च कर रहे हैं।

जब सरकार का सारा पैसा मुफ्त बिजली, पानी या नगद बांटने में चला जाता है, तो सड़क, अस्पताल, स्कूल, सिंचाई परियोजनाएं, उद्योग जैसे दीर्घकालिक बुनियादी ढांचों के निर्माण के लिए बजट नहीं बचता। यह भविष्य के विकास को पंगु बना देता है। यही नहीं, लोक-लुभावन नीतियां स्थायी रोजगार सृजन और औद्योगिक नीति बनाने के बजाय अस्थायी भत्ते देने पर ध्यान केंद्रित करती हैं। यह नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय सरकार पर निर्भर बनाती है। इसका असर यह होता है कि देश का ईमानदारी से कर चुकाने वाला मध्यम और उच्च वर्ग यह महसूस करता है कि उसके द्वारा दिये गए टैक्स का उपयोग देश के विकास के बजाय चुनावी लाभ के लिए मुफ्त रेवड़ियाँ बांटने में हो रहा है। इसका दुष्प्रभाव टैक्स चुकाने की प्रक्रिया पर पड़ता है। यही नहीं, लोकतांत्रिक प्रणाली में सभी दलों को समान रूप से जनता को प्रभावित करने का मौका होना चाहिए जो कि रेवड़ी प्रणाली की वजह से पूरा नहीं हो पाता है। सत्ताधारी दल सरकारी खजाने का उपयोग करके चुनाव से ठीक पहले बड़ी योजनाओं की घोषणा कर देता है, जिससे विपक्ष के समक्ष समानता का प्रश्न खड़ा हो जाता है। लोकतंत्र नीतियों, विचारधारा और सुशासन के आधार पर चलना चाहिए। जब चुनाव केवल 'कौन कितना मुफ्त देगा' की होड़ बन जाते हैं, तो मतदाता की तर्कसंगत निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। यह एक प्रकार से मतदाताओं को वैध तरीके से रिश्वत देने जैसा हो जाता है।

लोकतंत्र की स्वस्थता के लिए यह जरूरी है कि वास्तविक जनकल्याण से जुड़े वादे ही किये जायें। उन वादों से बचना चाहिए जो चुनाव जीतने के लिए किये जाते हैं। इस वैश्विक समस्या से निपटने और लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखने के लिए जरूरी है कि राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून का कड़ाई से पालन हो। इसके अलावा चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के लिए एक 'आर्थिक घोषणापत्र प्रारूप' अनिवार्य करना चाहिए, जिसमें दलों को अपने वादों की वित्तीय लागत और उसे पूरा करने का आर्थिक रोडमैप चुनाव से पहले जनता के सामने रखना पड़े। न्यायपालिका और स्वतंत्र वित्तीय निकाय की इसपर निगरानी होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण सुधार मतदाता की सोच में है। जनता को यह समझना होगा कि सरकारों के पास अपना कोई पैसा नहीं होता; वह जनता का ही टैक्स का पैसा है। मुफ्त के चक्कर में वे अपने बच्चों के भविष्य की बलि दे रहे हैं।

चुनाव पूर्व लोक-लुभावन वादे और मुफ्त घोषणाएँ लोकतंत्र के लिए एक दोधारी तलवार हैं, जहाँ एक ओर ये समाज के सबसे निचले और शोषित वर्ग को तत्काल राहत और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करके लोकतंत्र में उनका भरोसा बनाये रखती हैं, वहीं दूसरी ओर वित्तीय अनुशासनहीनता के कारण देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करती हैं और स्वस्थ लोकतांत्रिक बहसों को समाप्त करती हैं। इसलिए, लोकतंत्र के लिए यह प्रवृत्ति तब तक ही लाभप्रद है जब तक यह सशक्तिकरण पर केंद्रित हो, न कि निर्भरता पर। स्थायी परिसम्पत्तियों, कौशल विकास और बुनियादी ढांचे में निवेश करके ही एक वास्तविक और मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। केवल चुनावी वैतरणी पार करने के लिए सरकारी खजाने को लुटाना लोकतंत्र को खतरे में डालता है।