प्राचीन मनीषियों का अर्थ-चिंतन और आधुनिक अर्थव्यवस्था

कौटिल्य के अर्थशास्त्र की प्रासंगिकता आज भी बरकरार

Bharteey Dharohar

Courtesy: A. I.

अनंत काल से अध्यात्म प्रधान देश में लक्ष्मी भी उतनी ही सम्मानित रहीं जितनी दुर्गा और सरस्वती। धन, दौलत, ऐश्वर्य, समृद्ध और सुखी जीवन की मनुष्य की कामना हमारे ऋषि-मुनियों के अनुसार स्वाभाविक है। जिनके पास धन—सम्पदा का एक भाग है वह दो भाग की कामना करते हैं, जो दो भाग वाले हैं, तीन भाग की, तीन भाग वाले चार की, इससे अधिक सम्पदा वाले और अधिक की कामना करते हैं। ऋग्वेद के 10वें मण्डल 117वाँ सुक्त और 8वें मंत्र में सभी देवों— इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि से प्रचुर धन, सम्पत्ति और ऐश्वर्य की कामना की ऋचाएँ भरी पड़ी हैं। धनार्जन के साथ दान का महत्व भी वेदों में वर्णित है— दानी मनुष्यों के लिए कहा गया है कि स्वर्ग के उच्च पदों पर विराजमान होते हैं। ईशोपनिषद में सम्पत्ति का उपभोग आवश्यकता अनुसार करने को कहा गया है। यह सब मेरा नहीं है के भाव से धन संग्रह करना चाहिए। महाभारत के 'शांति पर्व' में धन—संग्रह की व्यवस्था चारों वर्णों के लिए की गई है— ब्राह्मण दान लेकर, क्षत्रिय शत्रु को जीत कर, वैश्य न्यायपूर्वक उपार्जन से और शूद्र सेवा द्वारा धन का संग्रह करें। अर्थ से ही धर्म और काम एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है। लोगों के जीवन का निर्वाह भी अर्थ के बिना सिद्ध नहीं हो सकता। शुक्राचार्य का मानना था पुरुष अर्थ का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं। मनु के अनुसार, अप्राप्य अर्थ को प्राप्त करने का प्रयत्न करें, प्राप्य अर्थ की यत्नपूर्वक रक्षा करें। रक्षित अर्थ की वृद्धि के लिए यत्न करें एवं अधिक वृद्धि से प्राप्त हुए अर्थ को सत्पात्रों में वितरित करें।

आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र

ईसा पूर्व 320 में सम्राट चंद्रगुरत मौर्य के गुरु आचार्य कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य और विष्णु गुप्त नाम से भी जाना जाता है, ने अर्थशास्त्र की रचना की। 8000 श्लोक वाले इस वृहद ग्रंथ में अर्थनीति राजनीति समाजशास्त्र, प्रशासन और न्याय यावस्था, गुप्तचरों और राजदूतों की नियुक्ति, युद्ध और शांति की रणनीति आदि विषयों की विशद व्याख्या की गई है। भारत को सोने की चिड़िया बनाने का श्रेय जिन महर्षियों को था उसमें कौटिल्य अग्रणी थे। ''प्रजा सुखे सुखम राज्ञ: प्रजा नाम च हिते हितम'' मंत्र कौटिल्य ने ही दिया था, जिसमें ऐसे राज्य की परिकल्पना की गई थी, जहाँ राष्ट्र का स्वामी सबको सुरक्षा दे, सबके साथ न्याय करे, राज्य का विस्तार करे और उसे समृद्ध बनाये, अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं अपितु जनहित में काम करे— ''योगक्षेम वहाम्यहम''। अनुशासित हो अपनी इंद्रियों को वश में रखे — राज्यस्य मूलं ​इन्द्रिय जय:। प्रशासनिक अधिकारियों को ईमानदारी से काम करने पर सम्मानित करें, सरकारी सम्पत्ति का गबन करने वाले या उसका दुरुपयोग करने वालों के लिए दंड की व्यवस्था करे। श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिले, महिलाओं, बूढ़ों और अशक्त लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ हों, कृषकों  और उद्यमियों को उनके उत्पाद पर लाभ मिले, किन्तु साथ ही उन्हें उपभोक्ताओं का शोषण करने से रोका जाये, जिसे उन्होंने कंटक शोधन की संज्ञा दी, बाजार में सही दामों में सही चीजें उपलब्ध हों। सरकार विदेश व्यापार को प्रोत्साहन दे, अनावश्यक वस्तुओं का आयात रोके, भारतीय व्यापारियों द्वारा समुद्री मार्ग से विदेशी बाजारों में माल ले जाने में लुटेरों, डाकुओं से सुरक्षा करे। सरकारी खजाना राज्य की समृद्धि और सुरक्षा है, उसको भरा रखे— आकर प्रभव कोष:। खर्चों के लिए उचित कर लगाये जिसे करदाता दे सकें। कर ऐसे वसूल किये जायें जैसे भँवरा फूलों का रस लेता है ​किन्तु उन्हें हानि नहीं पहुँचाता।

लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना
 
हिन्दू सम्राटों के समय में कृषि पशुपालन उद्योग और व्यापार के लिए भारत प्रसिद्ध था, लोग शिक्षित स्वस्थ और समृद्ध थे। विशाल समुद्री जहाजों, नौकाओं और रथों का निर्माण देश में होता था। सोने-चांदी के सिक्कों की ढलाई आकर्षक कीमती आभूषणों, सुगंध और श्रृंगार प्रसाधन सामग्री, सूती और रेशमी वस्त्र, लोहे लकड़ी एवं संगमरमर के सामान एवं अस्त्र-शस्त्र के निर्माण, जड़ी बूटियों और मसालों आदि के उत्पादन के लिए भारत विश्व में विख्यात था। स्वर्णकार, बढ़ई, लोहार, कुम्हार आदि द्वारा कुटीर उद्योगों का संचालन होता था। किसान समृद्ध थे, उत्तम बीज और सिंचाई के साधन प्रशासन की जिम्मेदारी थी। कृषि के साथ गोपालन जुड़ा था, दूध—दही की नदियाँ बहती थी। आर्थिक क्रियाकलापों में महिलाएँ पुरुषों की तरह ही सक्रिय थीं। भारत में मुगल आक्रमणकारियों का आना 1526 ईसवी से शुरू हुआ, सोने की चिड़िया के पंख उन्होंने नोचे, तलवार के बल पर मुगलिया शासन स्थापित किया। बाद में ब्रिटिश और अन्य यूरोपियन लुटेरों ने देश की संपत्ति लूटा, 200 वर्ष तक शासन किया। वहाँ के सत्याग्रह और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। 26 जनवरी 1950 को देश गणतंत्र बना, नया संविधान अपनाया गया, लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की नींव रखी गई।

संविधान के निर्देश

संविधान में केन्द्रीय और राज्य सरकारों को जो निर्देश दिये गए उनमें प्रमुख हैं— आय और अवसरों की असमानता कम करना, आजीविका के लिए पर्यात साधन उपलब्ध कराना, सामूहिक हित में संसाधनों का वितरण, धन का केन्द्रीकरण रोकना, ग्राम पंचायतों का गठन, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण, समान नागरिक संहिता, नशीले पदार्थों के उपभोग पर रोक, बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा आधुनिक वैज्ञानिक प्रणाली से कृषि और पशुपालन, दूध देने वाले पशुओं के वध पर प्रतिबंध, पर्यावरण संरक्षण न्यायपालिका की स्वतंता आदि। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समय-समय पर जो कानून बनाये गए उनमें प्रमुख हैं महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), न्यूनतम मजदूरी, बाल श्रम निषेध, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण, बाल श्रम प्रणाली उन्मूलन, सूचना का अधिकार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा दहेज प्रतिषेध, मातृत्व लाभ आदि के अधिनियम। कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा के लिए कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम और भविष्य निधि अधिनियम बनाये गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की सरकार में जो महत्वपूर्ण अधिनियम बने उनमें धारा 370 हटाने, भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नाय सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम सम्मिलित है। ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गए अधिकांश अधिनियमों को संशोधित किया गया या उनकी जगह नये अधिनियम लाये गए। लघु और मध्यम उद्योगों की सुरक्षा के लिए प्राव्धान किया गया, महिला आरक्षण अधिनियम पारित हो गया। तीन राज्यों- उत्तराखंड, गुजरात एवं असम में समान नागरिक संहिता लागू हुई।

निजीकरण की नीति

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस के हाथ में सत्ता आयी, उसके नेता मार्क्स और लेनिन के विचारों से अधिक प्रभावित थे, प्राचीन भारतीय मनीषियों और महात्मा गांधी के विचारों से कम। देश की अर्थनीति सोवियत मॉडल पर बनायी गई। सभी महत्वपूर्ण उद्योग सरकारी क्षेत्र में रखे गए, निजी क्षेत्र की उपेक्षा की गई। पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू हुईं, बहुउद्देशीय नदी घाटी योजनाओं और लोहे और इस्पात, अल्यूमिनियम, ताम्बे, जस्ते, फर्टिलाइजर, हैवी इलेक्ट्रिकल्स और मशीनरी, आयल एवं नेचुरल गैस, एटॉमिक एनर्जी आदि के नये उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में लगाये जाने लगे। आयात पर निर्भरता में कमी हुई। हरित क्रान्ति ने देश को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। शुरू के वर्षों में अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ, किन्तु बाद में सरकार की अर्थनीति की कमियाँ सामने आने लगीं। जिसे विदेशियों द्वारा हिन्दू विकास दर की संज्ञा देकर सनातन संस्कृति को बदनाम किया गया। भारत विश्व के गरीब देश में बना रहा, अर्थिक असमानता बढ़ी, लाइसेंस राज आ गया, सार्वजनिक क्षेत्र कुप्रबंध के कारण घाटे में जाने लगे। भ्रष्टाचार बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत का हिस्सा नहीं के बराबर रहा, विदेशी टेक्नोलॉजी और पूंजी, जो विकास के लिए आवश्यक होती है, नहीं आ ही थी। 1990 का दशक प्रारंभ होने के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था दिवालिया होने के कगार पर आ गई। विदेशी मुद्रा का भंडार मात्र एक विलियन डॉलर रह गया था। देश की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने हाथ फैलाना पड़ा, जिसने सरकार को अर्थनीति बदलने के लिए बाध्य कर दिया। निजीकरण एवं भौगोलीय-करण की नीति अपनानी पड़ी जो साम्यवादी—समाजवादी सोच के विपरीत थी। नयी नीति का अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। विकास दर में  तेजी आयी, किंतु प्रशासन में भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा। जनता ने 2014 में सरकार को बहर का रास्ता दिखा दिया।

बढ़ती अर्थव्यवस्था

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार की अर्थनीति सबका साथ सबका विकास भारतीय मनीषियों की सोच ''सर्वे भवन्तु सुखिन:'' को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास है। पिछले 12 वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है, आर्थिक शक्तियों में भारत चौथे स्थान पर है। विदेशी मुद्रा के भंडार में भारत विश्व के पाँच शीर्ष देशों में आ गया है। भारतीय वस्तुओं और सेवाओं में दुनिया का सबसे बड़ा रोड नेटवर्क अब भारत में है जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग मुख्य है, जिसकी लम्बाई 1 लाख 46 हजार 560 किलोमीटर है। पिछले एक दशक में 88 नये हवाई अड्डों का निर्माण हुआ। तीव्र गति से चलने वाली वन्दे भारत ट्रेनों की संख्या 160 हो गयी है। रक्षा प्रणाली और उपकरणों के आयात में कमी हुई है, निर्यात में निकार्ड वृद्धि हुई है। खाद्यान्नों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। दूध के उत्पादन में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। गेहूँ, चावल गन्ना और मछली के उत्पादन में दूसरे स्थान पर। विश्व बैंक के अनुसार, 2011—12 में भारत में गरीबी रेखा के नीचे 27 प्रतिशत लोग थे जो घटकर अब 5.3 प्रतिशत के लगभग हो गया है। गरीब परिवारों को सीधे उनके बैंक खाते में शौचालय निर्माण के लिए स्वच्छ भारत मिशन में 12 हजार रुपये की आर्थिक सहायता, आयुष्मान भारत के अंतर्गत 5 लाख रुपये तक की मुफ्त बीमा, पीएम किसान सम्मान योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष छोटे किसानों को छह हजार रुपये की वित्तीय सहायता दी जा रही है। मनरेगा की जगह नयी योजना विकसित भारत, जी राम जी बनायी गई है जिसमें ग्रामीण परिवारों के लिए 100 दिन की जगह 125 दिन के रोजगार की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आवास की व्यवस्था की जा रही है। सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भारी सब्सिडी दी जा रही है। आर्थिक विकास के साथ चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं, आबादी पर नियंत्रण के प्रयास कारगर बने हुए हैं, पर्यावरण प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। देश की सकल आय 10 वर्ष में दुगुनी हो गई है किंतु, प्रतिव्यक्ति आय विकसित देशों की अपेक्षा कम है। यूक्रेन—रूस, ईरान—इजरायल/अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है, जिससे पेट्रोल, डीजल, गैस, फर्टिलाइजर और औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका खामियाजा भारत सहित विश्व भर में आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है।
नोट: (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। इसे 'द फ्रीलांस मीडिया' का विचार न माना जाये।)