व्यावसायिक शिक्षा में इंडस्ट्रियल विजिट का महत्व

स्किल्स डेवलपमेंट के लिए मूल्यों पर आधारित शिक्षा जरूरी

Value-Based Education

Courtesy: Prof. Reeta Kumari

जैसा कि नाम से स्पष्ट है— 'नॉलेज पार्क'! यानी ऐसा पार्क जहाँ ज्ञान के पौधे ही पौधे हों।जी हाँ! बात हो रही है ग्रेटर नोएडा स्थित नॉलेज पार्क की। उत्तरप्रदेश के गौतमबुद्ध जिले में आनेवाला यह इलाका ज्ञान देनेवालों का पार्क ही है। एजुकेशन हब के रूप में इसका विकास किया गया है। इस इलाके में GNIOT, गलगोटिया यूनिवर्सिटी, शारदा यूनिवर्सिटी, अमिटी यूनिवर्सिटी सहित लगभग एक सौ बड़े—छोटे शिक्षण—संस्थान हैं। बीआइटी की भी इकाई यहाँ है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, मेडिकल और मैरिन सहित दर्जनों व्यावसायिक पाठ्यक्रम की शिक्षा प्राप्त करने देशभर से ही नहीं, नाइजीरिया, यूक्रेन सहित कई देशों से छात्र—छात्राएँ ​आते हैं। इसके अलावा, कई जाने-माने नेशनल और इंटरनेशनल स्कूल भी हैं। देश—प्रदेश के विकास में ग्रेटर नोएडा स्थित इन शिक्षण—संस्थानों का महत्वपूर्ण योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता।  

आजकल शिक्षा का मकसद मूल्यों पर आधारित (वैल्यू-बेस्ड) शिक्षा देना है, ताकि छात्र—छात्राओं में सही स्किल्स विकसित हों और वे प्राइवेट या पब्लिक सेक्टर की इंडस्ट्री में काम करने के काबिल बन सकें। यह सब 'करके सीखने' (learning by doing) के फॉर्मूले से होता है और इसके लिए एजुकेशनल संस्थान वर्कशॉप, इनडोर और आउटडोर कॉम्पिटिशन के साथ-साथ सेमिनार और कॉन्फ्रेंस भी आयोजित करते हैं। अलग-अलग मीडिया द्वारा चलाये जा रहे प्रोग्राम्स से जुड़ना भी सीखने और विकास का एक बड़ा प्लेटफॉर्म है। इसके लिए छात्रों एवं छात्राओं को अलग—अलग कम्पनियों या फैक्ट्रियों में विजिट कराया जाता है। निसबड, बॉन्जोर, याकुल्ट, डैनोन, पराग डेयरी मेरठ आदि ऐसे संस्थान हैं जो इस तरह के अवसर मुहैया कराते रहते हैं। इंडस्ट्रियल विजिट के माध्यम से छात्र—छात्राओं को यह समझने का मौका मिलता है इंडस्ट्री कैसे काम करती है, रेगुलेटरी फ्रेमवर्क क्या है, स्टैंडर्ड कौन तय करता है, आदि। वे पारम्परिक मैनुअल प्रोडक्शन के बजाय आज के असेम्बली लाइन प्रोडक्शन के बारे में सीखते हैं।

इंडस्ट्रियल विजिट से छात्र—छात्राओं को थ्योरी और प्रैक्टिस के बीच की दूरी कम कर पाते हैं। वे यह समझ पाते हैं कि किताबों में दी गई बातें असल में प्रोडक्शन फ्लोर, प्लांट या कॉर्पोरेट ऑफिस में कैसे काम करती हैं। उन्हें इससे    असल दुनिया का अनुभव होता है। पार्टिसिपेंट्स लाइव मशीनरी, वर्कफ़्लो मैनेजमेंट और क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम को खुद देखते और समझते हैं। एक्सपर्ट्स के साथ बातचीत उन्हें बहुत कुछ सीखने का मौका देता है। इंजीनियर्स, मैनेजर्स और टेक्नीशियन्स के साथ सीधे सवाल-जवाब के सेशन से ऐसी जानकारी मिलती है जो आम कोर्सवर्क में नहीं मिलती। उनमें करियर को लेकर स्पष्टता का मौका मिलता है। अलग-अलग भूमिकाओं को देखने से स्टूडेंट्स को मार्केटिंग, ऑपरेशन्स या इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में खास करियर रास्ते या स्पेशलाइज़ेशन चुनने में मदद मिलती है।
इंडस्ट्री प्रोफेशनल्स के साथ आमने-सामने बातचीत करने से भविष्य में इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स और नौकरी के मौके मिलते हैं। उनमें सॉफ्ट स्किल्स का विकास होता है। कॉर्पोरेट माहौल में जाने से स्टूडेंट्स का आत्मविश्वास बढ़ता है, टीमवर्क और प्रोफेशनल कम्युनिकेशन बेहतर होता है।  

हालाँकि, कई ऐसी संस्थाएँ हैं जिन्होंने इस तरह की गतिविधियों से खुद को अलग कर रखा है। ग्रेटर नोएडा की भी ज़्यादातर कम्पनियाँ छात्रों को इंडस्ट्रियल विज़िट की सुविधा नहीं दे रही हैं। कुछ कम्पनियाँ इस मामले में सही भी हैं क्योंकि वे ऐसी प्रक्रियाओं और उपकरणों के साथ काम करती हैं जो छात्रों की जान के लिए खतरनाक या जानलेवा हो सकते हैं, लेकिन ज़्यादातर कम्पनियाँ इस आधार पर मना कर देती हैं कि यह उनकी पॉलिसी का हिस्सा नहीं है। रजनीगंधा और पल्स बनाने वाली नोएडा के सेक्टर 16 स्थित डी. एस. ग्रुप कम्पनी के साथ ही, अनमोल बिस्किट्स, डी. एम. फूड्स (Crax), एलजी, ओप्पो आदि मल्टीनेशनल कंपनियाँ छात्रों को इंडस्ट्रियल विज़िट की अनुमति नहीं देती हैं। ये कम्पनियाँ इंडस्ट्रियल विजिट को अपनी पॉलिसी में शामिल नहीं किया है। अगर हर कम्पनी ऐसा ही व्यवहार करेगी, तो छात्रों को क्या हासिल होगा? सरकार को इस अहम मामले पर भी सोचने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि इस सम्बंध में कड़े नियम बनाये ताकि छात्रों को बेहतर शिक्षा मुहैया करायी जा सके। अगर छात्रों को इंडस्ट्री का अनुभव नहीं मिलेगा, तो उनकी रोज़गार पाने की क्षमता पर असर पड़ेगा। ग्रेटर नोएडा में काम करनेवाली उन नेशनल और मल्टीनेशनल कम्पनियों को भी सोचना होगा कि पिछले कई सालों से वो ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में काम कर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं और उनका कस्टमर बेस भी मज़बूत है। समाज के संसाधनों का इस्तेमाल करती हैं। इसका असर समाज पर पड़ता है। ऐसे में कम्पनी का भी फर्ज बनता है कि वह समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाए। उन कम्पनियों की तरह, जो अलग-अलग तरीकों से समाज को वापस कुछ दे रही हैं। पेड़-पौधे लगाने, पार्कों की देखभाल करने सहित कई तरह के चैरिटी के साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक विकास में कई कम्पनियाँ बढ़—चढ़कर हिस्सेदारी निभा रही हैं। कुछ कम्पनियाँ लोगों को मुफ़्त साफ़ पानी भी मुहैया करा रही हैं। अगर कोई कम्पनी या फ़ैक्टरी छात्रों को इंडस्ट्रियल विज़िट (औद्योगिक दौरा) का मौका देती है, तो यह भी समाज के लिए उनका एक बड़ा योगदान होगा।