इस प्रसिद्ध मंदिर में शिवजी को वैद्य के रूप में पूजा जाता है, जानिए अनोखी कहानी

पैदल 115 किलोमीटर चल भोलेनाथ को करते हैं जल का अर्पण

Baba Baidyanath Dham, Deoghar

वैद्यनाथ धाम (झारखंड): श्रावण के महीने में झारखंड के देवघर (Deoghar) का महत्व काफी बढ़ जाता है। यहाँ स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम (Biadyanath Dham) भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों (Jyotirlings) और 51 शक्तिपीठों (Shaktipeethon) में से एक अनूठा सिद्ध-क्षेत्र माना जाता है। देवघर में भगवान शंकर को ‘वैद्य’ (Doctor) रूप में पूजा जाता है, क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार उन्होंने रावण के घावों को ठीक किया था। इस स्थान को शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक के रूप में देखा जाता है। अन्य शिव मंदिरों के विपरीत यहाँ त्रिशूल की जगह एक विशेष पंचशूल सुशोभित है, जो सुरक्षा और दिव्यता का प्रतीक है। सावन के पावन महीने में बिहार के सुल्तानगंज (Sultanganj, Bihar) से गंगाजल लेकर लगभग 115 किलोमीटर की कठिन पैदल-यात्रा कर लाखों भक्त ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए बाबा को जल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से जल चढ़ानेवाले भक्तों के सभी शारीरिक कष्ट, रोग और पाप दूर होते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वैद्यनाथ धाम (Biadyanath Dham) का श्रावणी मेला (Shrawani Mela) धार्मिक इतिहास में एशिया का सबसे लम्बा चलनेवाला पैदल धार्मिक मेला माना जाता है। यह मेला सदियों पुराना है और इसका इतिहास पौराणिक कथाओं, भौगोलिक महत्व और भक्तों की अटूट साधना से जुड़ा हुआ है। 

पौराणिक कथाएँ

पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में लंकापति रावण के समय देवघर में शिवलिंग की स्थापना हुई थी। कहा जाता है, रावण ने लंका को अजेय बनाने और भगवान शंकर को अपनी नगरी में स्थापित करने के लिए महातपस्या की। महातपस्या के दौरान रावण ने अपने नौ सिर काटकर हवन कुंड में अर्पित कर दिये थे, जैसे ही वह दसवां सिर काटने लगा, भगवान शंकर ‘वैद्य’ रूप में प्रकट हुए और उन्होंने उनके दसों सिर को जोड़कर ठीक किया। भगवान के उसी वैद्य रूप पर इस स्थान का नामकरण वैद्यनाथ धाम किया गया। चूंकि भगवान शिव ने रावण को आरोग्य (वैद्य रूप में) किया था, इसलिए लोग असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए भी इस मेले में जल चढ़ाने आते हैं। 

कहा जाता है, रावण की महातपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर अर्थात भगवान शिव ने उन्हें (रावण को) मनोकामना शिवलिंग (ज्योतिर्लिंग) दी और शर्त रखी कि इसे रास्ते में कहीं भी जमीन पर नहीं रखना। देवता, खासकर भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि भगवान शिव लंका जायें। उन्होंने गंगा को रावण के पेट में समाने को कहा। रावण के पेट में गंगा के आने के बाद रावण को लघुशंका की इच्छा हो उठी। रावण ने वहाँ मौजूद बैजू नामक एक युवक को ज्योतिर्लिंग पकड़ने के लिए दे दिया और खुद लघुशंका करने चले गये। रावण कई घंटों तक लघुशंका करते रहे, जो आज भी वहां एक तालाब के रुप में मौजूद है। इधर, बैजू के रूप में खड़े भगवान विष्णु ने शिवलिंग वहीं पर रखकर स्थापित कर दिया। लौटने पर रावण ने देखा कि शिवलिंग जमीन पर रखा हुआ है। उसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की कई बार कोशिश की, लेकिन वह उठ नहीं सका। गुस्से में रावण ने शिवलिंग को अंगूठे से धरती के अंदर दबा दिया और खुद लंका चले गये । आज यह झारखंड के देवघर में प्रसिद्ध बैद्यनाथ धाम (Baba Baidyanath Temple) के रूप में जाना जाता है।

श्रावणी मेले का अन्य ऐतिहासिक तथ्य

पौराण्कि कथाओं में बताया गया है कि देवताओं और असुरों के बीच सावन के महीने में ही समुद्र मंथन हुआ था। मंथन से निकले ‘हलाहल’ (विष) को ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में समा लिया। विष की तीव्र जलन को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने उनपर पवित्र गंगाजल अर्पित किया था। उसी परम्परा के बाद से शिवजी को सावन में जल चढ़ाने और मेले की शुरुआत हुई। भगवान शिव को बिहार के सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा के जल का अर्पण किया जाता है। 

उत्तरवाहिनी गंगा का महत्व 

देवघर जानेवाले काँवरिया अपनी यात्रा की शुरुआत बिहार के भागलपुर जिलांतर्गत सुल्तानगंज से करते हैं। सुल्तानगंज में गंगा नदी पूर्व के बजाय उत्तर दिशा की ओर बहती है, जिसे उत्तरवाहिनी गंगा कहा जाता है। सदियों से भक्त यहाँ से काँवर में जल भरकर झारखंड के देवघर तक की लगभग 115 किलोमीटर की दूरी पैदल और नंगे पाँव तय करते हैं। पूरी यात्रा के दौरान केवल ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष गूंजता रहता है। 
ऐतिहासिक और आधुनिक स्वरूप ऐतिहासिक दस्तावेजों में बताया गया है कि 16वीं शताब्दी में आमेर के राजा मानसिंह ने इस मंदिर परिसर का विस्तार कराया था। इसके बाद से ही मेले के स्वरूप में और अधिक विस्तार होने लगा। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भी इस मेले की विशालता को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्थाएं की जाती थीं। वर्तमान समय में इसे झारखंड और बिहार सरकार द्वारा राजकीय श्रावणी मेला के रूप में आयोजित किया जाता है, जहाँ पूरे एक महीने में करोड़ों श्रद्धालु देवघर पहुँचते हैं।

हृदय पीठ या शक्ति पीठ?

मान्यता है कि सतयुग में ही इस स्थान का नामकरण वैद्यनाथ धाम कर दिया गया था। शिवपुराण के शक्ति खंड में इस बात का उल्लेख है कि माता सती के शरीर के 52 खंडों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने सभी जगहों पर भैरव को स्थापित किया था। देवघर में माता का हृदय गिरा था। इसलिए इसे हृदय पीठ (Hridaypeeth) या शक्ति पीठ (Shaktipeeth) भी कहते हैं। माना जाता है कि माता के हृदय की रक्षा के लिए भगवान शिव ने यहां जिस भैरव को स्थापित किया था, उनका नाम वैद्यनाथ था। इसलिए जब रावण शिवलिंग को लेकर यहाँ पहुंचे, तो भगवान ब्रह्मा और बिष्णु ने भैरव के नाम पर उस शिवलिंग का नाम वैद्यनाथ धाम रख दिया। जानकारों की मानें तो इस नामकरण के पीछे एक और मान्यता है। त्रेतायुग में बैजू नाम का एक शिव भक्त था। उसकी भक्ति से भगवान शिव इतने प्रसन्न हुए कि अपने नाम के आगे बैजू जोड़ लिया। इसी से यहां का नाम बैजनाथ पड़ा। कालांतर में यही बैजनाथ, बैद्यनाथ में परिवर्तित हुआ।

कैसे पहुँचें देवघर?

श्रद्धालुगण देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक झारखंड स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम (देवघर) देश के कोने-कोने से ट्रेन, विमान या सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंच सकते हैं। देवघर का अपना घरेलू हवाई अड्डा (Devghar Airport) है, जो मुख्य शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर है। यहां दिल्ली और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों से सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं। देवघर का मुख्य और सबसे नजदीक बड़ा रेलवे स्टेशन जसीडीह जंक्शन (JSME) है, जो दिल्ली-हावड़ा मेन लाइन पर स्थित है। जसीडीह से देवघर की दूरी लगभग 7 से 10 किलोमीटर है, जहां से ऑटो, टैक्सी या ई-रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं। इसके अलावा देवघर जंक्शन (DGHR) के लिए भी कुछ सीधी ट्रेनें चलती हैं। जहाँ तक सड़क मार्ग (Roadways) की बात है, देवघर राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों द्वारा रांची (243किलोमीटर), पटना (230 किलोमीटर) और कोलकाता (270 किलोमीटर) जैसे पड़ोसी शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। यहाँ बस या टैक्सी से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

कहाँ ठहरें?

देवघर में मंदिर के आसपास बजट होटल से लेकर धर्मशालाओं तक रुकने के कई बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं। प्रमुख धर्मशालाओं में बाबा मंदिर के नजदीक यात्रियों के लिए शांति सरोजिनी आश्रम, गौरी आश्रम, योगमाया निवास और ज्ञान गंगा आश्रम के साथ ही वसुधैव कुटुम्बकम जैसी कई किफायती धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं। यहाँ मात्र 400 से शुरुआती कीमत पर कमरे मिल जाते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम में उसके सदस्यों के लिए निःशुल्क ठहरने की व्यवस्था है। मोबाइल नम्बर 9430677036 पर सम्पर्क कर यह लाभ उठाया सकता है। मंदिर के आसपास और टावर चौक क्षेत्र में सभी बजट के साफ-सुथरे होटल, गेस्ट हाउस एवं डॉरमेट्री मौजूद हैं, जिन्हें आप अपनी सुविधा अनुसार चुन सकते हैं।