Courtesy: A.I.
एन. चन्द्रशेखरन के फरवरी 2027 में टाटा संस के चेयरमैन पद से हटने की घोषणा ने उद्योग जगत को चौंका दिया है। टाटा समूह की पहचान केवल एक बड़े कारोबारी साम्राज्य के रूप में नहीं, बल्कि भरोसे, परंपरा और दूरदर्शिता के प्रतीक के रूप में होती है। ऐसे में जब टाटा संस के चेयरमैन एन. चन्द्रशेखरन ने फरवरी 2027 में अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ने का संकेत दिया, तो यह फैसला पूरे कारोबारी जगत के लिए महत्वपूर्ण खबर बन गया।
लगभग एक दशक तक समूह का नेतृत्व करने वाले चन्द्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह ने कई ऐसे क्षेत्रों में कदम रखा, जिन्हें कभी भारत के लिए दूर का सपना माना जाता था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके बाद समूह की कमान कौन संभालेगा और क्या नया नेतृत्व इस महत्वाकांक्षी विरासत को आगे बढ़ा पायेगा?
बोर्ड में असहमति से शुरू हुआ बदलाव
बताया जाता है, फरवरी 2026 में टाटा संस के बोर्ड की बैठक में चन्द्रशेखरन का कार्यकाल पांच वर्ष बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जतायी। उनकी चिंताएँ समूह के नये और बड़े निवेशों, उनके प्रदर्शन तथा भविष्य में उनसे मिलने वाले रिटर्न को लेकर थीं। बोर्ड में प्रस्ताव पर पूर्ण सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद चन्द्रशेखरन ने अपने कार्यकाल के विस्तार के लिए आगे न बढ़ने का निर्णय लिया और फरवरी 2027 में वर्तमान कार्यकाल पूरा होने पर पद छोड़ने की घोषणा की। यह फैसला व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक संस्थागत सहमति और सुचारू उत्तराधिकार की आवश्यकता को दर्शाता है।
ए. चन्द्रशेखरन और उनका करियर
2 जून 1963 को तमिलनाडु के मोहनुर में जन्में एन. चन्द्रशेखरन ने 1987 में टीसीएस से एक ट्रेनी के रूप में जुड़े और लगभग चार दशकों के सफर के बाद जनवरी 2017 में टाटा सन्स के पहले गैर-पारसी चेयरमैन बने। उनकी तकनीकी शिक्षा कोयम्बटूर में हुई थी। उन्होंने कोयम्बटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एप्लाइड साइंसेज में बीएससी और एन आइ टी त्रिची से एमसीए की डिग्री प्राप्त की। एन. चन्द्रशेखरन ने करियर की शुरुआत टाटा समूह में टीसीएस से की। 2009 में इसके सीईओ और एमडी बने। 2017 में टाटा संस के चेयरमैन चंद्रशेखरन को रतन टाटा ने अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल किया। कुछ महीनों बाद ही जनवरी 2017 में उन्हें चेयरमैन बनाया गया। उन्होंने साइरस मिस्त्री की जगह ली। ये वो वक्त था, जब रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच विवाद को मीडिया में सुर्खियाँ मिल रही थीं।
एन. चन्द्रशेखरन ने अपना सारा जीवन टाटा समूह में ही बिताया। अपने करियर के दौरान उन्होंने लगभग 10 साल भारत से बाहर बिताया। अमेरिका, यूके, स्वीडन में टाटा ग्रुप के लिए काम किया। इसके बाद उन्होंने टीसीएस में अपनी सक्रियता बढ़ाई, जहाँ उनका कद बढ़ता गया। उनके कार्य करने के तरीके और लीडरशिप से टाटा ग्रुप के मुखिया रतन टाटा काफी प्रभावित थे। चन्द्रशेखरन के करियर में अहम मोड़ तब आया जब वर्ष 2009 में टीसीएस के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर बने। वह इस पद पर आठ साल रहे। इस दौरान आइटी सर्विस कम्पनी दुनिया की प्रमुख टेक्नोलॉजी और कंसल्टिंग फर्मों में से एक बन गयी।
चंद्रशेखरन के कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियाँ
एन. चन्द्रशेखरन ने फरवरी 2017 में टाटा संस की कमान संभाली थी। उनके नेतृत्व में समूह ने पारंपरिक कारोबार को मजबूत करने के साथ-साथ तकनीक, डिजिटल सेवाओं, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा जैसे भविष्य के क्षेत्रों में बड़े निवेश किये।
उनके कार्यकाल की सबसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक उपलब्धियों में एयर इंडिया की टाटा समूह में वापसी रही। वर्षों बाद एयर इंडिया फिर उसी समूह का हिस्सा बनी, जिसने कभी इसकी नींव रखी थी। इस अधिग्रहण ने टाटा समूह को विमानन क्षेत्र में एक नयी भूमिका दी, हालांकि इसके साथ बड़े परिचालन और वित्तीय जोखिम भी जुड़े हुए हैं।
चन्द्रशेखरन ने समूह की विभिन्न कम्पनियों के बीच सहयोग और तालमेल बढ़ाने पर भी जोर दिया। इस रणनीति का उद्देश्य टाटा ब्रांड की साझा ताकत का लाभ उठाना और कम्पनियों को अलग-अलग द्वीपों की तरह काम करने के बजाय एक व्यापक कारोबारी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाना था। इसी दौर में समूह ने सेमीकंडक्टर निर्माण, चिप डिजाइन, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, डिजिटल कॉमर्स और अक्षय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू कीं। इन पहलों ने टाटा समूह को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की कोशिश की, लेकिन अब इन परियोजनाओं को व्यावसायिक रूप से सफल बनाना अगली नेतृत्व टीम की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
उत्तराधिकारी की तलाश में संभावित नाम
चन्द्रशेखरन के बाद उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया जल्द शुरू किये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि नेतृत्व परिवर्तन बिना किसी व्यवधान के पूरा हो सके। मीडिया रिपोर्टों में टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक टी. वी. नरेन्द्रन का नाम संभावित दावेदारों में प्रमुखता से सामने आया है।
नरेन्द्रन लम्बे समय से टाटा समूह से जुड़े रहे हैं और औद्योगिक क्षेत्र में उनका अनुभव व्यापक है। टाटा स्टील जैसे वैश्विक कारोबार का नेतृत्व करने के कारण वे बड़े परिचालनों, अंतरराष्ट्रीय बाजारों और जटिल कारोबारी परिस्थितियों से परिचित हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय एक औपचारिक चयन प्रक्रिया और संभावित रूप से पांच सदस्यीय समिति की सिफारिश के आधार पर लिये जाने की संभावना है।
नोएल टाटा के नाम को लेकर भी चर्चा स्वाभाविक रूप से उठती है, लेकिन समूह के संशोधित नियमों के अनुसार टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन और टाटा संस का चेयरमैन एक ही समय पर एक व्यक्ति नहीं हो सकता। नोएल टाटा वर्तमान में टाटा ट्रस्ट्स का नेतृत्व कर रहे हैं, इसलिए वो इस पद की दौड़ में शामिल नहीं होंगे।
नये चेयरमैन के सामने कठिन चुनौतियाँ
नये चेयरमैन के सामने सबसे पहली चुनौती उन परियोजनाओं को लाभदायक बनाना होगी, जिनमें समूह ने भारी पूंजी लगायी है। सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी उत्पादन जैसे कारोबार लम्बे समय में बड़ा अवसर दे सकते हैं, लेकिन इनके लिए भारी निवेश, तकनीकी दक्षता और धैर्य की आवश्यकता होगी।
डिजिटल क्षेत्र में टाटा न्यू जैसे प्लेटफॉर्म को स्थापित ई-कॉमर्स कम्पनियों के मुकाबले मजबूत बनाना भी आसान नहीं होगा। ग्राहक अनुभव, तकनीकी एकीकरण और लाभप्रदाता, इन तीनों मोर्चों पर नये नेतृत्व को स्पष्ट रणनीति बनानी होगी।
एयर इंडिया का कायाकल्प दूसरी बड़ी चुनौती होगी। एयर इंडिया और विस्तारा के विलय के बाद परिचालन को सुचारू बनाना, सेवा की गुणवत्ता सुधारना, समय की पाबंदी बढ़ाना और बड़े विमान ऑर्डर के बीच वित्तीय अनुशासन बनाये रखना जरूरी होगा। विमानन कारोबार में ब्रांड की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है, लेकिन अंततः सफलता का मापदंड मुनाफा और विश्वसनीय सेवा ही होगी। इसके अलावा, नये चेयरमैन को टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड के साथ मजबूत तालमेल बनाये रखना होगा। बड़े और जोखिमपूर्ण निवेशों पर बोर्ड की सहमति हासिल करना अब पहले से कहीं अधिक आवश्यक होगा। समूह के मुनाफे और लाभांश में टीसीएस की बड़ी भूमिका को देखते हुए, अन्य कारोबारों को भी मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहेगा।
विरासत और भविष्य के बीच संतुलन
एन. चन्द्रशेखरन का कार्यकाल टाटा समूह के लिए परिवर्तन का दौर रहा है। उन्होंने समूह को पारम्परिक औद्योगिक पहचान से आगे ले जाकर तकनीक और भविष्य के कारोबारों की दिशा में बढ़ाने की कोशिश की। अब उनके उत्तराधिकारी के सामने चुनौती केवल नयी योजनाएँ शुरू करने की नहीं, बल्कि शुरू की जा चुकी योजनाओं को परिणाम में बदलने की होगी।
टाटा समूह का अगला अध्याय इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व परम्परा और आधुनिकता, जोखिम और अनुशासन तथा तेज विस्तार और दीर्घकालिक स्थिरता के बीच कितना संतुलन बना पाता है। चन्द्रशेखरन के बाद आनेवाला चेयरमैन केवल एक पद नहीं संभालेगा, वह भारत के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूह की अगली दिशा तय करेगा।