एफसीआरए (FCRA) पर विपक्षी दलों के सुर तल्ख क्यों?

बिल को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के अपने-अपने दावे

एफसीआरए (FCRA) पर विपक्षी दलों के सुर तल्ख क्यों?

इसी साल मार्च के महीने में हुए संसद के बजट सत्र के दौरान एक विधेयक आया, नाम था एफसीआरए यानी फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट, यह बिल संसद में क्या आया, विपक्ष सहित कई स्वयं सेवी संस्थाएं सड़कों पर उतर आईं। आलम यह है कि संसद के मानसून सत्र में भी इस बिल को लेकर फिलहाल गतिरोध कायम है। बिल को लेकर  विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के अपने-अपने दावे हैं, और संभावना यह भी है कि बिल को पास कराने के लिए सरकार 12 अगस्त को यह बिल चर्चा के लिए सदन में पेश कर सकती है। एफसीआरए पर विपक्षी दलों का सुर तल्ख क्यों है? इसे जानने से पहले एफसीआरए को समझ लेते हैं।

एफसीआरए (FCRA)

25 मार्च 2026 को जब सरकार यह संशोधन विधेयक लेकर आई थी तो उस वक्त छह बिंदु सबसे ज्यादा चर्चा में रहे थे :

जो बिंदु सबसे ज्यादा चर्चा में है वह प्रस्तावित विधेयक का सेक्शन 16A है। यह प्रावधान कहता है कि अगर किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रिन्यू नहीं होता या रद्द हो जाता है या फिर संस्था खुद ही उसे सरेंडर कर देती है, तो विदेशी चंदे के रूप में मिला धन, संपत्तियां चाहे वह स्कूल या अस्पताल कुछ भी हों भारत सरकार के तय प्राधिकरण यानी डिजिग्नेटेड अथॉरिटी अपने नियंत्रण में लेगी। साथ ही उसके बेचने पर पैसा सीधे भारत सरकार की संचित निधि में जाएगा। इस प्रस्तावित सेक्शन पर आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था धार्मिक संस्थाओं, स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक संस्थाओं की संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का रास्ता खोल सकता है। वहीं इसपर सरकार का तर्क है कि यदि संबंधित संस्था दोबारा पात्र हो जाती है तो अथॉरिटी की तरफ से उसे संपत्ति वापस कर दी जायेगी। 

दूसरे बिंदु में कहा गया कि कोई NGO अपना विदेशी चंदा किसी दूसरी संस्था को ट्रांसफर नहीं कर सकेगी। यानी जिस NGO को विदेश से चंदा मिला है वही उसका उपयोग कर सकेगी साथ ही पैसा किस मद में कहां खर्च किया गया उसका लेखाकृजोखा भी सरकार को सौंपना होगा। 

इसी तरह आगामी बिंदुओं में शर्त रखी गई कि NGO रजिस्ट्रेशन के लिए उसके सभी पदाधिकारियों का आधार जरूरी है और विदेशी चंदा एसबीआई यानी स्टेट बैंक आफ इंडिया की नई दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में ही जमा कराया जा सकेगा। इसके अलावा NGO से लोक सेवकों मसलन सांसद, विधायक, सरकारी कर्मियों को पूरी तरह दूर करते हुए स्पष्ट किया गया कि वे विदेशी चंदा लेने के हकदार नहीं होंगे।

संशोधन विधेयक में NGO’S के लिए यह शर्त भी निर्धारित की गई है कि यदि कोई NGO अगर अपना रिन्यूवल में देरी करती है तो उसका रजिस्ट्रेशन स्वत: मतलब अपने आप निरस्त या खत्म हो सकता है। इसके अलावा अगर भारत सरकार भी चाहे तो वह किसी NGO के लाइसेंस को एक साल तक सस्पेंड यानी निलंबित रख सकती है।

यहां एक वाजिब सवाल यह है कि आखिर सरकार एफसीआरए के नियमों को इतना कड़ा क्यों कर रही है ?

तो इस सवाल के जवाब में सरकार का तर्क है कि पुराने कानून में खामी थी और विदेशी फंड का इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जा रहा है। ऐसे में कानून में संशोधन करके सरकार विदेशी फंड्स के दुरुपयोग और धर्मांतरण पर होने वाले खर्च पर लगाम लगाना चाहती है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि विदेश से आने वाले पैसों को धार्मिक शिक्षा के लिए किया जा सकता है लेकिन धर्म परिवर्तन के लिए इसका इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अब बात करते हैं कि विपक्ष किन तर्कों के आधार पर इस संशोधन विधेयक का विरोध कर रहा है ?

कांग्रेस ने अपने सभी सांसदों को एकजुट होकर एफसीआरए विधेयक का विरोध करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों से भी इस मुद्दे पर समर्थन मांगा है। इधर, कांग्रेस के नेता मनीष तिवारी ने विधेयक को ’मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और सनकी’ बताया है तो वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव का आरोप है कि एफसीआरए में संशोधन करके भारतीय जनता पार्टी गैर सरकारी संगठनों को नियंत्रित करना चाहती है साथ ही कठपुतली बनाकर धीरे-धीरे उनकी संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है।

इसी बीच मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी इसी बिल को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और उस मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से बिल को लेकर चिंताएं गृह-मंत्री के साथ साझा की गईं, उनकी तरफ से छह मुद्दे उठाए गए जिनमें से एक पर शाह की तरफ से उन्हें भरोसा दिलाया गया कि इस बिल को पिछली तारीख से लागू ‘रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट’ नहीं किया जाएगा। शेष मुद्दों पर गृह मंत्री की तरफ से लिखित जवाब दिया जायेगा उसके बाद स्थिति स्पष्ट होगी।

इधर, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विधेयक में संशोधन का उद्देश्य फंड्स के कथित दुरुपयोग को रोकना और राष्ट्र हित को प्राथमिकता देना है।

इसी बीच शुक्रवार यानी 7 अगस्त को द्रविड़ मुनेत्र कड़घम के राज्यसभा सदस्य पी. विल्सन के नेतृत्व में ईसाई नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी गृह-मंत्री से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत सरकार का ईसाई समुदाय या किसी भी धर्म या समुदाय को परेशान करने का कोई इरादा नहीं है। इसके साथ ही अमित शाह ने ईसाई संगठनों को भरोसा दिया है कि प्रस्तावित एफसीआरए विधेयक किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है और यह विधेयक पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है।

वैसे इस विधेयक की गूंज सिर्फ भारत तक ही सामित नहीं विदेश, खासतौर से अमेरिका में भी इसकी चर्चा है। अमेरिका के सत्ताधारी दल रिपब्लिकन पार्टी के नेता राउली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने एफसीआरए बिल को क्रिश्चियेनिटी पर हमला बताया। पोस्ट में उन्होंने संभावना जताई है कि इस संशोधन विधेयक के पारित होने से भारत-अमेरिका के संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। मूर का यह भी कहना है कि इस संशोधन से भारत सरकार, चर्च और रिलीजियस चैरिटी का कंट्रोल अपने हाथों में लेना चाहती है।

मूर साहब शायद यह भूल रहे हैं कि भारत एक संप्रभु देश है और यहां के जिम्मेदार नागरिकों ने लोकतांत्रिक रूप से एक जिम्मेदार सरकार चुनी है। भारत सरकार राष्ट्र हित में कानूनी संशोधन का अधिकार रखती है। भारत, भारतीय संविधान के अनुसार चलता है कि अमेरिकी, यूरोपीय अथवा किसी अन्य राष्ट्र के दिशानिर्देशों पर।

खैर, अब सवाल यह है कि क्या एफसीआरए संशोधन विधेयक मानसून सत्र में सदन में रखा जायेगा? क्या सरकार उन सभी संशोधनों के साथ इस विधेयक को सदन में प्रस्तुत करेगी या फिर कुछ बिंदुओं पर पुनर्विचार किया जायेगा? क्या इसी मानसून सत्र में विधेयक को दोनों सदनों से पास करवा लिया जायेगा? यह कुछ प्रश्न हैं जिनका जवाब निकट भविष्य में ही मिल सकेगा।

आप इस विधेयक के बारे में क्या विचार रखते हैं, कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमारे साथ साझा कीजिये।

(लेखक ’द फ्रीलांस मीडिया’ के समूह सम्पादक हैं)