भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन त्योहार

राखी बांध बहनें करती हैं भाई की लम्बी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना

भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन त्योहार

Courtesy: AI

नयी दिल्ली। रक्षाबंधन का त्योहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं, उनकी लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। इसके बदले भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। क्या आप जानते हैं रक्षाबंधन का त्योहार क्यों मनाया जाता है? आज हम उसी पर चर्चा करेंगे।

वैसे तो रक्षाबंधन से जुड़ी अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। परंतु हम यहाँ प्रमुख पौराणिक कथाएँ और कहानियों की चर्चा करेंगे। उन्हीं प्रमुख पौराणिक कथाओं में है इन्द्र और इन्द्राणी की कहानी। भविष्य पुराण में कहा गया है कि देवाताओं और दानवों के युद्ध में जब असुरों ने देवताओं पर संकट बढ़ाया, तब देवराज इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी, जिन्हें शची नाम से भी जाना जाता है, ने श्रावण पूर्णिमा के दिन अपने पति की रक्षा के लिए एक पवित्र रक्षासूत्र तैयार कर इन्द्र की कलाई पर बांधा था। इसी से इन्द्र को विजय मिली। 

एक अन्य कथा है राजा बलि और माता लक्ष्मी की। दानव राज बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके यहाँ पहरेदार बन गए थे। माता लक्ष्मी उन्हें वापस बैकुंठ लाना चाहती थीं। तब उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि को राखी बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया और उपहार में विष्णु जी को मांग लिया।

रक्षाबंधन को लेकर कृष्ण और द्रौपदी की कथा भी काफी मशहूर है। महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली सुदर्शन चक्र से कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्ला फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दिया था। इस स्नेह से बंधकर भगवान श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाकर अपने भाई होने का धर्म निभाया था। इसी तरह मृत्यु के देवता यमराज लम्बे समय तक अपनी बहन यमुना से नहीं मिल पाये थे। तब यमुना ने श्रावण पूर्णिमा के दिन यमराज को अपने घर बुलाकर तिलक किया और राखी बांधी। इस पर प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना को अमरता का वरदान दिया।
 
रक्षाबंधन के इतिहास में रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूँ की कहानी सबसे प्रसिद्ध और भावुक मानी जाती है। यह घटना मध्यकालीन भारत की है। ईस्वी सन् 1530 के दशक में, मेवाड़ (चित्तौड़गढ़) के राजा राणा सांगा की मृत्यु के बाद उनकी विधवा महारानी कर्णावती अपने छोटे बेटे के नाम पर शासन संभाल रही थीं। मेवाड़ को कमजोर पाकर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने एक बड़ी सेना के साथ चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया। अपनी प्रजा और राज्य को संकट में देखकर रानी कर्णावती ने एक अनोखा और साहसिक कदम उठाया। उन्होंने दिल्ली के मुगल सम्राट हुमायूँ को एक पवित्र राखी और सहायता का संदेश भेजा। उन्होंने हुमायूँ को भाई मानकर अपनी और चित्तौड़गढ़ की रक्षा करने की गुहार लगायी। कहा जाता है, हुमायूँ उस समय बंगाल के सैन्य अभियान में व्यस्त था। लेकिन जब उसे एक हिन्दु रानी का रक्षासूत्र और पत्र मिला, तो वह इस पवित्र रिश्ते के सम्मान से बेहद प्रभावित हुआ। उसने तुरंत अपना अभियान बीच में ही रोका और अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की ओर निकल पड़ा। दुर्भाग्य से, दिल्ली से चित्तौड़ की दूरी बहुत अधिक थी और हुमायूँ समय पर वहाँ नहीं पहुँच सका। सुल्तान बहादुर शाह की बड़ी सेना के सामने राजपूत सैनिक कम पड़ गए। जब रानी कर्णावती को लगा कि हार निश्चित है, तो उन्होंने अन्य राजपूत महिलाओं के साथ सामूहिक आत्मदाह (जौहर) कर अपनी लाज बचाई। जब हुमायूँ चित्तौड़ पहुँचा, तब तक सब कुछ समाप्त हो चुका था। अपनी 'बहन' को न बचा पाने के दुख में उसने बहादुर शाह की सेना पर भीषण आक्रमण किया, उसे खदेड़ा और चित्तौड़गढ़ को वापस जीतकर रानी कर्णावती के पुत्र विक्रमादित्य को सौंप दिया। यह कहानी सिखाती है कि रक्षाबंधन का धागा केवल सगे भाई-बहन या एक धर्म तक सीमित नहीं है। यह आपसी विश्वास, सम्मान और संकट में मदद का प्रतीक है।