अमेरिका में 7 लाख भारतीय आइटी प्रोफेशनल्स को लग सकता है बड़ा झटका

ट्रम्प प्रशासन खत्म करेगा एच—वन बी वीजा का 60 दिन का ग्रेस पीरियड

ट्रम्प प्रशासन खत्म करेगा एच—वन बी वीजा का 60 दिन का ग्रेस पीरियड

Courtesy: A. I.

नयी दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने H-1B सहित कई अन्य रोजगार-आधारित नॉन-इमिग्रेंट वीजा धारकों को नौकरी जाने के बाद मिलने वाली 60 दिनों की ग्रेस पीरियड को पूरी तरह समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है। अगर यह प्रस्ताव अमल में आता है, तो नौकरी छूटने के तुरंत बाद विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) द्वारा पेश किये गए इस नये प्रस्ताव के तहत E-1, E-2, E-3, H-1B, H-1B1, L-1, O-1 और TN वीजा धारकों के लिए मौजूदा 60 दिनों की मोहलत खत्म हो जायेगी। साल 2017 से लागू इस नियम के तहत यदि किसी H-1B कर्मचारी की नौकरी चली जाती थी, तो उसे अमेरिका में रहकर नयी नौकरी तलाशने, नया वीजा स्पॉन्सर ढूँढ़ने या फिर अपना घर बेचने और बच्चों को स्कूल से निकालने जैसे व्यक्तिगत कार्यों को समेटने के लिए 60 दिनों का समय मिलता था। लेकिन ट्रम्प प्रशासन के इस कड़े कदम के बाद यह सुविधा पूरी तरह छिन जायेगी। 

अमेरिकी प्रशासन का यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है तो सबसे अधिक परेशानी उन आइटी पेशेवरों को होगी जो भारत से अमेरिका जाकर वहाँ नौकरी कर रहे हैं। लगभग सात लाख लोग भारतीय आइटी पेशेवर अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं। अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका द्वारा जारी किये जाने वाले कुल H-1B वीजा में से 70 प्रतिशत से 72 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारतीयों का होता है। एक अकेले वित्त वर्ष में ही लगभग 2.78 लाख भारतीयों को H-1B वीजा स्वीकृत हुए थे, जिनमें से लगभग 1.8 लाख (65 प्रतिशत) सिर्फ कम्प्यूटर और आइटी क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स थे। वर्तमान में लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स H-1B और L-1 वीजा पर सालों से अमेरिका में काम कर रहे हैं और स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) मिलने का इंतजार कर रहे हैं। इसके अलावा, एक बड़ी संख्या उन भारतीय-अमेरिकियों की भी है जो पहले आइटी इंजीनियर के रूप में अमेरिका गये थे और अब वहां के स्थायी नागरिक बन चुके हैं। 

चूँकि अमेरिका में H-1B वीजाधारकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है, इसलिए इस फैसले की सबसे बड़ी मार भारतीय टेक वर्कर्स पर ही पड़ेगी। नौकरी जाने की स्थिति में उनके पास नया एम्प्लॉयर ढूंढने का समय नहीं बचेगा और उन्हें तुरंत भारत डिपोर्ट होने का खतरा सताने लगेगा। H-1B वीजा का उपयोग मुख्य रूप से तकनीकी और विशेषज्ञता वाली नौकरियों के लिए किया जाता है। अमेरिकी दिग्गज टेक कम्पनियाँ और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, एचसीएल टेक और एलटीआइमाइंडट्री जैसी आउटसोर्सिंग कम्पनियाँ हर साल भारत से हजारों स्किल्ड प्रोफेशनल्स को इसके जरिये नियुक्त करती हैं। 

अमेरिकी टेक इंडस्ट्री और इमिग्रेशन एक्सपर्ट्स ने अमेरिकी सरकार के इस प्रस्ताव पर चिंता जाहिर की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नियम न केवल विदेशी कर्मचारियों और उनके परिवारों को मानसिक और वित्तीय संकट में डालेगा, बल्कि उन अमेरिकी कम्पनियों को भी प्रभावित करेगा जो अपनी कार्यबल आवश्यकताओं के लिए वैश्विक प्रतिभाओं पर निर्भर हैं। इस प्रस्ताव के कानून का रूप लेने के बाद कम्पनियों की मानव संसाधन टीमों के लिए भी छंटनी और ऑफबोर्डिंग की प्रक्रियाओं को संभालना बेहद जटिल हो जायेगा।

हालाँकि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने इस फैसले को जायज ठहराते हुए कहा है कि इस बदलाव से खाली होने वाले पदों पर स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को रोजगार के अवसर मिल सकेंगे। प्रशासन का मानना है कि कम्पनियाँ विदेशी पेशेवरों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिकी कार्यबल को प्राथमिकता दें। यह कदम ट्रम्प के उसी सख्त इमिग्रेशन एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत हाल ही में वीजा फीस बढ़ाने जैसे कई अन्य कड़े प्रस्ताव भी लाये गए हैं।