Courtesy: A. I.
नयी दिल्ली। भारत की राजधानी दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन हो रहा है। ब्रिक्स का यह 18वाँ शिखर सम्मेलन है। नयी पीढ़ी की उत्सुकता होगी कि ब्रिक्स है क्या? इसे जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि इसकी स्थापना किसने और क्यों की? BRICS की औपचारिक शुरुआत साल 2006 में चार देशों ब्राजील, रूस, इंडिया और चाइना ने मिलकर की थी। इन देशों के नाम का पहला अक्षर मिलाकर उस समय इसका नाम ब्रिक (BRIC) रखा। उस समय वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर लम्बे समय से उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के अमीर देशों, जिसे G7 देश नाम से जाना जाता था, का एकाधिकार था। वैश्विक मंच पर विकासशील देशों (Global South) के हितों को मजबूती से रखने के लिए इस समूह का गठन किया गया। 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में इसका पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका (South Africa) के इस समूह में शामिल होने के बाद इसका नाम बदलकर 'BRICS' हो गया। इसके मुख्य उद्देश्यों में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वर्ल्ड बैंक जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में विकासशील देशों की हिस्सेदारी और आवाज को बढ़ाना है। इसके अलावा, आपस में व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना एवं अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम करना भी इसका एक बड़ा लक्ष्य रहा है। अभी ब्रिक्स में सदस्य देशों की संख्या 11 है। ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया, सऊदी अरब और भारत हैं। संक्षेप में कह सकते हैं कि BRICS दुनिया के उन बड़े देशों का क्लब है, जो अब पश्चिमी देशों यानी अमेरिका और यूरोप की आर्थिक और राजनीतिक दादागिरी के विकल्प तलाश रहे हैं। पूरी दुनिया की आधी आबादी और एक बड़ा आर्थिक हिस्सा इस समूह के पास है।
अब सवाल उठता है कि यह शिखर सम्मेलन दिल्ली में क्यों हो रहा है? ब्रिक्स के पिछले सम्मेलन में ही यह तय हो गया था कि साल 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत में होगा और इसकी अध्यक्षता भारत करेगा। उसी तय कार्यक्रम के मुताबिक राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स के सदस्य देशों के दिग्गज नेता जुटे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति तक इस समय दिल्ली में मौजूद हैं। भारत के लिए यह मेजबानी सिर्फ एक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि यह साबित करने का मौका है कि भारत विकासशील देशों का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है और पश्चिम तथा पूर्व, दोनों के साथ संतुलन बना सकता है। इसका असर दुनिया के आर्थिक और व्यापारिक समीकरण को बदलने में होगा। डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापार स्थानीय मुद्राओं में करने की बात जोर पकड़ रही है। डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, सप्लाई चेन को मजबूत करना और तकनीकी सहयोग इसके बड़े आर्थिक प्रभाव हैं। लेकिन भू-राजनीतिक मोर्चे पर यह देखना दिलचस्प है कि भारत इस विविधता को कैसे संभालता है। इसी भू-राजनीतिक संतुलन और कूटनीतिक कसरत की सबसे बड़ी तस्वीर तब सामने आती है जब बात साझा बयान की होती है। जैसा कि मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि ब्रिक्स समिट 2026 में दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती संयुक्त बयान को लेकर फँसी हुई है, क्योंकि पश्चिमी एशिया युद्ध और मक्का पैक्ट जैसे मुद्दों पर ईरान, सऊदी अरब, यूएई और चीन के अपने-अपने समीकरण और आपसी मतभेद हैं।
हाल ही में वेस्ट एशिया में जिस तरह से तनाव बढ़ा है और अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच स्थितियाँ उलझी हैं, उसका असर ब्रिक्स की बैठकों पर साफ दिख रहा है। पिछले दिनों विदेश मंत्रियों की बैठक में भी ईरान और यूएई के अपने अलग रुख के कारण साझा बयान अटक गया था और भारत को चेयरपर्सन का बयान जारी करके काम चलाना पड़ा था। अब दिल्ली शिखर सम्मेलन में भी यही पेच फँसा है कि पश्चिमी एशिया के संकट और क्षेत्रीय युद्ध पर ऐसा क्या लिखा जाये जिससे सभी देश सहमत हो जायें। एक तरफ ईरान और रूस चाहते हैं कि अमेरिका और पश्चिमी नीतियों के खिलाफ तीखी और स्पष्ट भाषा का इस्तेमाल हो, वहीं भारत यह भी ध्यान रख रहा है कि पश्चिमी देशों के साथ उसके अपने रणनीतिक और आर्थिक हित प्रभावित न हों।
यही कारण है कि ब्रिक्स के प्रतिनिधि सदस्य और कूटनीतिक अधिकारी दिल्ली में दिन-रात एक करके ऐसी भाषा तलाशने में जुटे हैं जो बिना किसी बड़े विवाद के इस ऐतिहासिक मंच को एकजुट रख सके। 'मक्का पैक्ट' का हिस्सा होना और ब्रिक्स में सऊदी अरब द्वारा एक साथ बैठना यह दिखाता है कि आज के दौर में देश किसी एक खेमे में बंधने के बजाय हर जगह अपनी सुरक्षा और कूटनीति के हिसाब से दांव खेल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने यह एक बड़ी और बारीक कूटनीतिक चुनौती है कि इन तमाम विरोधाभासों के बीच ब्रिक्स की गाड़ी को पटरी से उतरने न दिया जाये और दुनिया को सहयोग और संवाद का मजबूत संदेश दिया जाये।