Courtesy: A. I.
नयी दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है, बिना किसी बड़े सुपरस्टार, बिना करोड़ों के तड़क-भड़क वाले VFX और बिना किसी शोर-शराबे के कोई फिल्म सिनेमाघरों में 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकती है? मैं कहूंगी, हाँ, कर सकती है। फिल्म की स्टोरी यदि आम जनमानस की भावनाओं से जुड़ी हो, जो सुनने में अच्छा लगे, ऐसे संवाद हों और मधुर संगीत हो तो निश्चित तौर पर दर्शकों का आकर्षण ऐसी फिल्मों के प्रति बढ़ेगा। ऐसी ही एक फिल्म आयी है 'हनुमान अंश'! हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' इस समय बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ा चमत्कार बनकर उभरी है! महज 10 लाख रुपये की ओपनिंग से शुरुआत करने वाली नीम करोली बाबा पर आधारित इस फिल्म ने 'मिर्जापुर: द मूवी' और 'टॉक्सिक' जैसी बड़ी फिल्मों को टक्कर दी है।
नीम करोली बाबा खुद में एक चमत्कार थे। उनके चमात्कारिक गुणों की कायल भारतीय ही नहीं, अंग्रेज अफसर तक थे। 'हनुमान अंश' जिस नीम करोली बाबा के जीवन पर बनायी गई है उनका असली नाम है लक्ष्मण दास शर्मा, एक ऐसा युवक, जिसके मन में जीवन, मृत्यु, इंसान के दुखों और इस संसार के बंधनों को लेकर अनगिनत सवाल उठते रहे। अपने इन्हीं सवालों के जवाब और सत्य की तलाश में लक्ष्मण दास शर्मा नामक युवक एक कठिन आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ता है। फिल्म बहुत ही खूबसूरती से दिखाती है कि कैसे यह साधारण युवक आगे चलकर पूरी दुनिया के चहेते संत, यानी 'नीम करोली बाबा' उर्फ महाराज जी के रूप में तब्दील होता है। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह केवल उनके चमत्कारों पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि यह उनके 'प्रेम और सेवा' के संदेश को बहुत ही गहराई से हमारे सामने रखती है।"
एक ऐसा संत, जिन्होंने न तो कोई बड़ा ग्रंथ लिखा, न कभी घंटों लम्बा उपदेश दिया। जो सिर्फ एक लकड़ी के तख्त पर बैठता था और शरीर पर एक साधारण चेकदार कम्बल लपेटता था। लेकिन उनके आध्यात्मिक आकर्षण का असर ऐसा था कि भारत के आम लोगों से लेकर एप्पल के स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग तक, उनके दर पर खिंचे चले आये। बीसवीं सदी के महान और रहस्यमयी संत बाबा नीम करोली आखिर कौन थे और क्या था उनके चमत्कारों का सच? इसे जानते हैं, बने रहिए मेरे साथ।
बाबा नीम करोली का जन्म लगभग साल 1900 में उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गाँव में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम लक्ष्मण दास शर्मा था। कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया, लेकिन उनका मन तो प्रभु भक्ति में रमा था। शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने घर छोड़ दिया और एक साधु की तरह देश भर में साधना करने लगे। देश के कुछ हिस्सों में बाबा नीम करोली को बीसवीं सदी का भगवान भी कहा जाता है।
क्या आप जानते हैं, उन्हें 'नीम करोली' नाम कैसे मिला? एक बार बाबा बिना टिकट ट्रेन में सफर कर रहे थे। टीटीई ने उन्हें 'नीम करोली' नाम के एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन से नीचे उतार दिया। बाबा बिना किसी शिकायत के मुस्कुराते हुए ट्रेन से नीचे उतरकर बैठ गए। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने सबको चौंका दिया। लाख कोशिशों के बाद भी ट्रेन का इंजन टस से मस नहीं हुआ। जब लोगों ने बाबा से वापस ट्रेन में बैठने की प्रार्थना की, तो बाबा के कदम रखते ही ट्रेन तुरंत चल पड़ी। उस घटना के बाद लोग उन्हें बाबा कहने लगे। चूँकि यह चमत्कार नीम करोली नामक स्थान पर हुआ था इसलिए लोग उन्हें 'नीम करोली बाबा' कहने लगे।
भक्त मानते हैं कि बाबा साक्षात हनुमान जी के अवतार थे। उनके जीवन से कई ऐसी रहस्यमयी घटनाएं जुड़ी हैं जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझा सकता। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, बाबा झांसी में अपने एक डॉक्टर भक्त के घर ठहरे थे। डॉक्टर का बेटा बर्मा के मोर्चे पर लड़ रहा था। एक रात बाबा अचानक बेचैन हो गए, कम्बल ओढ़कर कराहते रहे और सुबह उन्होंने वह कम्बल नदी में फेंकने को कह दिया। हफ्तों बाद बेटे की चिट्ठी आयी कि उस रात भयंकर गोलीबारी के बीच वह चमत्कारिक रूप से बच गया, जबकि गोलियाँ उसके बिल्कुल पास से गुजरी थीं। भक्तों के लिए बाबा का कम्बल एक सुरक्षा कवच बन गया था।
ऐसा ही एक और किस्सा है साल 1953 का। हनुमानगढ़ी में भंडारे के दौरान अचानक देशी घी खत्म हो गया। बाबा के कहने पर रसोइए नदी से पानी भरकर लाये और कड़ाही में डालते ही वह पानी शुद्ध देसी घी में बदल गया।
बाबा हमेशा कहते थे कि पानी का घी बनना या रुकी हुई ट्रेन का चलना असली चमत्कार नहीं है। सबसे बड़ा चमत्कार है— एक स्वार्थी मन का प्रेम से भर जाना और किसी के दुख को देखकर दिल में करुणा पैदा होना। बाबा की शिक्षाएँ बेहद सरल थीं, जिन्हें वो केवल तीन शब्दों में समेट देते थे— "लव ऑल, सर्व ऑल, रिमेम्बर गॉड" यानी सभी से प्रेम करो, सभी की सेवा करो और ईश्वर को याद रखो।
बाबा के लिए भक्ति का मतलब सिर्फ मंदिर में पूजा करना नहीं था। वह भूखे को भोजन कराना भगवान की सबसे बड़ी सेवा मानते थे। यही वजह है कि आज भी उनके स्थापित किये गए कैंची धाम में आने वाले हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के आदरपूर्वक प्रसाद और भोजन कराया जाता है।
11 सितम्बर 1973 को बाबा ने अपने इस भौतिक शरीर का त्याग कर दिया, लेकिन उनकी चेतना और उनकी करुणा आज भी उनके करोड़ों भक्तों के दिलों में जीवित है। बाबा ने सिखाया कि ईश्वर को ढूंढने के लिए पहाड़ों पर जाने की जरूरत नहीं, बस अपने भीतर के अहंकार को खत्म कर इंसानियत से प्यार करना सीख लो।
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